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ब्लॉग वार्ता : पॉकेट बुक्स के शेर

हिंद पॉकेट बुक्स, साधना पॉकेट बुक्स, मनोज पॉकेट बुक्स और डायमण्ड पॉकेट बुक्स। सत्तर और अस्सी के दशक के ये जेबी संस्करण आज के ब्लॉग समान हुआ करते होंगे। रचनाओं का इतना सुलभ भंडार। रेलगाड़ी किसी स्टेशन पर रूकी नहीं कि एस. सी. बेदी का राजन इकबाल सीरीज ठेले पर सबसे पहले दिखता था।

काटरून, कॉमिक्स और लुगदी साहित्य की अपनी विशाल दुनिया है। साहित्य में इन्हें लुगदी कहा गया, मगर इसी लुगदी में से कई गुदड़ी के लाल पैदा हुए हैं। आज भी ये दुनिया आबाद है बस हम कम जानते हैं। एक ब्लॉगर ने हम सब का काम आसान कर दिया है। क्लिक कीजिए http:// comic- guy.blogspot. com

इस ब्लॉग पर एस. सी. बेदी के राजन इकबाल की तस्वीर देख कर सिहरन सी पैदा हो गई है। परिचय में तीन लोगों के नाम हैं। अरुण मिश्रा, प्रशांत और विनित अब्राहम।

काटरून और कॉमिक्स के प्रति इनकी दीवानगी का ही नमूना है ये ब्लॉग। अंग्रेजी में लिखते हैं, लेकिन बात यहां हिंदी के उस जमाने की भी है, जब दुनिया इंद्रजाल लगती थी। इनका टाइटल मनमोहन देसाई की फिल्मों के टाइटल जैसा ही होता था। लेकिन इसके लेखक ओरिजनल रहे, इसमें कोई संदेह नहीं।

इसमें वेद प्रकाश शर्मा, सुरेंद्र मोहन पाठक जैसे कहानिकारों का शानदार दौर रहा है। इंसाफ का सूरज, विधवा का पति, केशव पंडित और दुल्हन मांगे दहेज। इस ब्लॉग पर इन उपन्यासों के कवर की तस्वीरें हैं। मुझे तो कभी पढ़ने का मौका नहीं मिला लेकिन अपने मोहल्ले और घरों में देखा है कि कैसे लोग छुपा कर लाते थे। पड़ोसी से मांग कर लाते थे और किराये पर भी लाते थे। चाय की दुकान वाले के पास एक आलमारी भी देखी थी।

मुझे जो बात सबसे हैरान करती थी वो ये कि इस तरह के उपन्यासों को लोग घंटे भर में कैसे पढ़ लेते थे। इस ब्लॉग पर मनोज के एक उपन्यास नजराना की तस्वीर है। जिसके बैक कवर पर लिखा है कि यदि आप दिल की गहराइयों को छू लेने वाली कहानी पसंद करते हैं और यदि आपने आज तक मनोज का कोई उपन्यास नहीं पढ़ा है तो विश्वास कीजिए कि आप आज तक उस चीज से वंचित रहे हैं, जिसकी आपको काफी पहले से तलाश थी। लुगदी साहित्य के कहानीकारों को इसी तरह से लांच किया जाता था। आगे लिखा जाता है कि प्रमाण के लिए आप मनोज का एक उपन्यास पढ़ कर देख लीजिए आपके होठों पर फैलने वाली मुस्कान और आंखों से टपकने वाले आंसू यकीन दिला देंगे कि जो कहानी मनोज लिखा करता है वो आपकी अपनी कहानी है।

इतने विश्वास और शानदार तरीके से हिंदी साहित्य परंपरा में न तो मुक्तिबोध लांच हुए और न ही उदय प्रकाश। इनकी रचनाएं दुनिया में लोकप्रिय रही, लेकिन किसी प्रकाशक ने इन्हें इस तरह से पेश नहीं किया। लुगदी साहित्य को खारिज करने की परंपरा रही है, लेकिन कोई इनकी लोकप्रियता को स्वीकार नहीं कर सका। लेखक में प्रकाशक का ही भरोसा होता था कि बैक कवर पर चेतावनी होती थी- उपन्यास खरीदने से पहले एक बात का ध्यान रखें। कहानीकार मनोज के उपन्यास सिर्फ मनोज पॉकेट बुक्स से प्रकाशित होते हैं।

कॉमिक्स बुक के पुराने किरदारों का संगम है यह ब्लॉग। पाठकों की मांग पर एक रुपये में मिलने वाली मधुमुस्कान का कवर छपा है। एक अनजान कॉमिक्स के बारे में पूछा गया है, जिसका नाम है स्पेस स्टार। यह ब्लाग इस तरह की रचनाओं पर किसी रिसर्च प्रोजेक्ट जैसा लगता है। पता चलता है कि इनमें से एक ब्लॉगर आलोक काटरूनों पर डॉक्यूमेंट्री बना रहे हैं।

आलोक और मशहूर काटरूनिस्ट प्राण की तस्वीर छपी है। चाचा चौधरी का दिमाग कंप्यूटर से भी तेज चलता है। घर-घर में कंप्यूटर शब्द पहुंचाने का श्रेय सिर्फ प्राण को जाना चाहिए।

बिल्लू और पिंकी की तस्वीरें देख कर मन खिल उठता है। बचपन में जब हम पढ़ते थे तो इसी चक्कर में रहते थे कि साबू इतना खाता कैसे है। चाची तो बनाते बनाते परेशान हो जाती होगी।

जानकारियों का खजाना है यह ब्लॉग। फिल्म पत्रिका शमा और सुषमा की भी तस्वीर है। शमा उर्दू में और सुषमा हिंदी में छपती थी। बॉलीवुड फिल्मों की मशहूर पत्रिका। आज के जमाने के लोग नहीं ही जानते होंगे, लेकिन अगर यह जानना चाहें कि फिल्म रिपोर्टिंग की शुरुआत कैसे हुई तो इस ब्लॉग पर आकर शमा की तस्वीरें देख सकते हैं। बेताब और आप तो ऐसे न थे की तस्वीर सुषमा के कवर पर है। पत्रिका पीली पड़ चुकी है लेकिन यादें बिल्कुल हरी-हरी लगती हैं। काटरून कोना ढब्बू जी से लेकर प्रतिभाशाली बीरबल के कवर भी है इस ब्लॉग पर।

ravish@ ndtv. com
लेखक का ब्लॉग है naisadak. blogspot. com

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