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रोटी और स्वामित्व

बुद्घ के जीवन की एक घटना है। उनके शिष्य एक व्यक्ति को लेकर आए और उनसे धर्म-तत्व समझने की प्रार्थना की, क्योंकि उनके उपदेशों को वह समझ नहीं पा रहा था। बुद्घ ने कहा- पहले इसे खाने को दो। यह भूखा है। पेट भर जाने के बाद समझेगा धर्म। भूखे पेट को धर्म की बात करना उसका अपमान करना है। बुद्ध के इस धर्म की बात को अगर पारंपरिक अर्थ में न लेकर जीवन के संदर्भ में लें तो बहुत सारी समस्याओं का समाधान हो सकता है। आज देश के अनेक हिस्सों में नक्सल आंदोलन ने गहरी जड़ें जमा ली हैं। उसके मुकाबले या उसे नेस्तनाबूद करने के लिए केन्द्र और राज्य सरकारों ने पूरी ताकत लगा दी है। मगर इस आंदोलन के कारणों को या तो समझने की कोशिश नहीं की गई है या जानबूझकर अनदेखा किया जा रहा है। साधारण सी बात है। इस आंदोलन के पीछे रोटी, जीवन-यापन और अधिकार पाने की इच्छा है। इसमें गलत क्या है? महावीर कहते हैं- जिजीविषा सार्वभौम सत्ता है। जीवन की इच्छा सबकी है, अतः जीने का अधिकार भी सबका है। जीवन के लिए सर्वाधिक आवश्यक है सांस, फिर है पानी। तीसरी आवश्यकता है आहार। तीनों प्रकृति की देन है। प्रकृति ने तीनों का स्वामित्व न अपने पास रखा है न किसी को दिया है। लेकिन आदमी ने व्यवस्था के नाम पर जमीन पर स्वामित्व की विभाजन रेखाएं खींच दी। उसकी उपज को भी संपत्ति बनाकर उस पर व्यक्तिगत मिल्कियत की मुद्रा अंकित कर दी है। रोटी को क्रय-विक्रय की वस्तु बना दिया है। इसलिए महावीर कहते हैं कि रोटी से किसी को वंचित करने का अधिकार किसी को नहीं है। जमीन उसकी है जो उसे अपने श्रमशीकर से सींचता है। व्यवस्था ने प्रकृति की हर चीज का बंटवारा किया और उस पर स्वामित्व का आरोपण भी कर दिया। इससे समाज में एक और अभाव का खाई गड्ढा बन गया और दूसरी ओर अति-भाव का पहाड़ खड़ा हो गया। जितना खर्च हर साल नक्सलवाद को मिटाने में किया जा रहा है, उतने में तो जरूरतमंदों को खुशहाल किया जा सकता था।

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