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जहानाबाद और जमुई के बाद लखीसराय में छुड़ाये साथी

जहानाबाद, जमुई और अब लखीसराय। यह तीसरी बार है जब माओवादियों ने हमला कर अपने साथी को पुलिस के कब्जे से छुड़ा लिया है। 2005 में जहानाबाद जेल पर हमला करके माओवादी अपने सभी साथियों को छुड़ाकर ले गए थे।

इस वर्ष की शुरूआत में ही जमुई में माओवादियों ने पुलिस दल पर हमला करके अपने साथियों को छुड़ाया था। जहानाबाद में उनका हमला रात में हुआ था और माओवादियों की पूरी फौज ने जहानाबाद शहर पर कब्ज कर लिया था।

लखीसराय में माओवादियों ने दिन दहाड़े हमला करके न केवल अपने साथी बाबूलाल बेसरा को छुड़ाया बल्कि राइफलें भी लूटकर चले गए। बेसरा भाकपा माओवादी की बिहार-झरखंड एरिया कमेटी के प्रमुख नेताओं में से एक है।

इससे पता चलता है कि बांका और जमुई के साथ-साथ लखीसराय में भाकपा माओवादी ने अपनी ताकत कितनी बढ़ा ली है। लखीसराय में माओवादियों का हमला उस समय हुआ जब उनके द्वारा बंद को लेकर राज्य सरकार ने जिलों को एलर्ट कर रखा था।

इसके बावजूद माओवादी आये, हमला किया, अपने साथी को छुड़ाया और पुलिस की राइफलें लेकर चलते बने। घटना के एक दिन पहले ही केन्द्र सरकार ने भाकपा माओवादी को आतंकी संगठन घोषित कर दिया था। मतलब यह कि संगठन को आतंकी घोषित किए जाने के बावजूद माओवादियों पर कोई असर नहीं पड़ा है।

भारत में माओवादी राजनीति के जनक चारू मजुमदार ने दो बातें कहीं थी। पहली बात तो यह कि दुश्मन का शस्त्रागार हमारा शस्त्रागार है। लिहाज दुश्मन से हथियार छीनकर अपनी ताकत बढ़ाओ। दूसरी बात यह कि जेल हमारे विश्वविद्यालय हैं।

जेल से बाहर निकलने के लिए कानून का सहारा मत लो, इसे ब्रेक करो। माओवादी आज भी इसे आदर्श वाक्य की तरह स्वीकार करते हैं। वैसे अब माओवादी नेता भी जमानत लेकर जेल से बाहर निकलने लगे हैं।

भाकपा माओवादी का गठन वर्ष 2004 में हुआ था और गठन के बाद से ही माओवादी अपने तेवर दिखा रहे हैं। 

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  • Web Title:माओवादियों ने अपनी ताकत दिखाई