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गरीबों का चूल्हा और अमीरों का प्रदूषण

तकरीबन 24 साल पहले की बात है। मैं राजस्थान के शहर उदयपुर के एक गांव में थी। एक सरकारी कर्मचारी मुझे समझा रहा था कि सुधारा गया चूल्हा कैसे काम करता है। इसे एक रसोई में लगाया गया था। यह वह समय था जब भारत में जंगलों की बर्बादी को लेकर जगरूकता आने लगी थी। तब एक धारणा यह थी कि गरीब लोग खाना पकाने के लिए लकड़ी जलाते हैं और इसी से जंगलों को नुकसान पहुंचता है। यह भी माना जता था कि चूल्हे से धुंआ उठता है, जो कैंसर जैसे रोगों का कारण होता है, इसी वजह से औरतें इस रोग की सबसे बड़ी शिकार बनती हैं। हल यह निकाला गया कि ऐसा चूल्हा बनाया जाए, जिसमें जलने का अच्छा प्रावधान हो और एक चिमनी हो, जिससे खाना पकाने वाली औरतों को नुकसान न हो।

इस नए चूल्हें में एक औरत खाना पका रही थी। मैंने उससे पूछा कि क्या सरकार ने उसे जो चूल्हा दिया है, उससे वह खुश है। उसका जवाब था, ‘यह देखने में अच्छा है, पर काम नहीं करता, मैंने इसमें बदलाव किया है’। उसकी समस्या यह थी कि घर का खाना बड़े बर्तनों में ही बन सकता था। नया चूल्हा छोटा था, आग के लिए थोड़ी सी ही जगह थी, इसलिए वह उसके किसी काम का नहीं था।

जब चूल्हे का डिजाइन तैयार किया गया तो किसी ने उससे नहीं पूछा कि उसकी जरूरत क्या है। किसी ने उसे थर्मोडायनमिक का सिद्धांत नहीं बताया, जिससे वह जान पाती कि चूल्हा कैसे जलता है। कोई चूल्हे को ठीक करने या उसकी जरूरत के मुताबिक बनाने के लिए उसके पास नहीं आया। उसने बस चूल्हे का अगला हिस्सा तोड़ा और जरूरत के मुताबिक जलावन डालने की जगह बना ली। स्थानीय विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला में थर्मोडायनामिक की कई गणनाओं के बाद सरकार के कार्यक्रम के तहत उस चूल्हे को बनाया गया होगा, लेकिन सब बेकार साबित हो गया। उस दिन मैंने अपनी जिंदगी का यह सबसे बड़ा सबक सीखा कि लोगों की तरह-तरह की जरूरतों और उनकी क्रय क्षमता के हिसाब से चीजों को डिजाइन करना, इंसान को चांद पर भेजने से भी ज्यादा जटिल काम है।

एक नजर डालते हैं सरकारी आंकड़ों पर। 1994 तक देश भर में 1.5 करोड़ नए चूल्हे बांटे गए। नेशनल कौंसिल ऑफ एप्लाइड इकॉनमिक रिसर्च के एक सव्रे में पाया गया कि चूल्हे का डिजाइन ठीक नहीं था और ज्यादातर मामलों में वह टूट गया। 62 फीसदी लोगों ने कहा कि उन्हें नहीं पता कि इसे ठीक कराने के लिए किसके पास जाना होगा। कोई हैरत की बात नहीं। गरीबों तक तकनीक पहुंचाना एक ऐसा काम है, जिसे बाजार ठीक से नहीं कर पाता।

लेकिन मैं इस इतिहास का जिक्र अब क्यों कर रही हूं? चूल्हे फिर वापस आ गए हैं। इस बार विश्व स्तर पर। विज्ञान ने काले कार्बन को कटघरे में खड़ा किया है, कहा जा रहा है कि यह पर्यावरण परिवर्तन का बड़ा गुनहगार है। यह हवा को गर्म करता है, वह जब ग्लेशियरों पर पहुंचता है  तो वे पिघलने लगते हैं। यानी अब फिर से गरीबों के घर के चूल्हे से निकलने वाली कालिख, जलाए जानी वाली लकड़ियों, टहनियों और उपलों पर बतंगड़ खड़ा हो गया है। अमेरिकी कांग्रेस में एक बिल पेश हुआ है, जिसमें ब्लैक कार्बन को कम करने की बात कही गई है। इसके विदेशों में मदद का भी प्रावधान है, साथ ही दो करोड़ घरों को आधुनिक चूल्हे देने का भी।

ब्लैक कार्बन के विज्ञान से मुङो कोई एतराज नहीं है। और यह तर्क भी नहीं दिया जा सकता कि गरीबों के चूल्हे में सुधार की कोई जरूरत ही नहीं है। समस्या नीयत की भी नहीं है। समस्या यह है कि इसके लिए ‘क्या’ और ‘कैसे’ किया जना चाहिए। आज अंतरराष्ट्रीय बिरादरी इस चूल्हे को आसान समाधान माने बैठी है। यह कहा जा रहा है कि 18 फीसदी समस्या इसी से पैदा होती है, सो इसी को हटा दो। इस सीधे समाधान की दिक्कत यह है कि यह कारों और विद्युत संयंत्रों से प्रदूषण जारी रखने की रियायत दे रहा है। अंतरराष्ट्रीय बिरादरी उन गरीब लोगों के उत्सजर्न की बात कर रहे हैं, जो जलाऊ लकड़ियां और सूखी पत्तियां ढूंढने के लिए मीलों घूमने को मजबूर हैं। जो सूखे गोबर को सिर्फ इसलिए तलाशते हैं, ताकि वे अपना खाना पका सकें।

उसके सामने हमारे और आपके द्वारा फैलाया गया उत्सजर्न है, जो कार से दफ्तर जाते हैं और एयरकंडीशन कमरे में दिन गुजरते हैं। नीति बनाने और उसे लागू करने के लिए यह फर्क करना बहुत जरूरी है। वर्ना हम भविष्य में उत्सजर्न को कम करने का वह अवसर खो देंगे जो हमें ये गरीब उपलब्ध कराते हैं। इस अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को पता नहीं है कि ये गरीब कैसे जिंदा रहते हैं और सबसे ज्यादा प्रदूषण करने वालों में कितना ज्यादा घमंड है। ये गरीब लोग चूल्हा इसलिए जलाते हैं क्योंकि उनके पास इतने पैसे नहीं हैं कि वे व्यावसायिक ईंधन को खरीद सकें। पर्यावरण के बदलावों को रोकने की कुंजी भी उन्हीं के पास है।

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के 2006 के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया की 13 फीसदी ऊर्जा ऐसी है, जिसे हम रिन्यूएबल यानी फिर से इस्तेमाल लायक मानते हैं। और इस ऊर्जा में भी चार फीसदी हिस्सा सौर्य और पवन ऊर्जा के स्रोतों से आता है। पनबिजली बस 16 फीसदी ही है। बाकी लगभग 80 फीसदी हिस्सा बायोमॉस या जव उत्पादों से आता है, यानी उन्हीं चूल्हों से जिन्हें दुनिया भर के गरीब जलाते हैं। इसलिए ये लोग समस्या का कारण नहीं हैं, ये लोग तो समाधान का रास्ता हैं। ऊर्जा का यह सारा चक्र ऐसा है कि जब ये लोग अपनी गरीबी से मुक्ति पाते हैं तो वे इन चूल्हों से मुक्ति पा लेते हैं और रसोई गैस जसे फॉसिल्स ईंधन को अपना लेते हैं।

हर बार जब ऐसा होता है तो रिन्यूएबल ऊर्जा इस्तेमाल करने वाला एक परिवार कम हो जाता है। और फिर वह हमारी तरह ही ग्रीन हाउस गैसों का उत्सजर्न करने लगता है। काले धुंए का प्रदूषण स्थानीय होता है, यह खाना बनाने वाली औरत के लिए सबसे बड़ी समस्या खड़ी करता है। कार्बन डाईऑक्साइड के विपरीत यह कुछ ही सप्ताह में खत्म हो जता है। हमें इन गरीबों के तरीके को खत्म करने के बजए ऐसा रास्ता निकालना चाहिए कि हम भी उनके रास्ते को अपना सकें। यह आसान नहीं होगा, यह सस्ता भी नहीं होगा। विज्ञान को ऐसे चूल्हे को इजाद करना ही होगा, जो जव उत्पादों    का इस्तेमाल करके हर तरह के घरों में इस्तेमाल हो सके। क्या हम इस चुनौती के लिए तैयार हैं।

लेखिका सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की निदेशक है।

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