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शिक्षा : किसकी जरूरत का सामान हैं ये बच्चे

पिछले दिनों सभी समाचार पत्रों में एक खबर छपी ‘सावधान, आ रहे हैं हिंदी-चीनी’। हिंदी चीनी जब साथ छपा देखता हूं तो मैं चौंक जाता हूं ।चाऊ  एन लाइ और नेहरू ने हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा लगाया था, उसका नतीजा जो हुआ उसने सबसे पहले नेहरू की ही बलि ली। ईश्वर के लिए दोनों को साथ-साथ न रखो। लेकिन यह समाचार बिल्कुल भिन्न था। अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा ने अपने देश के लोगों को आगाह करने के लिए कहा कि भारतीय और चीनी अधिक मेहनती और मेधावी हैं।

अमेरिका के बच्चे फिसड्डी होते जा रहे हैं। इस तरह की चिंता व्यक्त करने वाले वे पहले राष्ट्रपति हैं। उनकी यह चेतावनी कि अब कमर कसकर सावधान होने की जरूरत है, क्योंकि भारतीय और चीनी आ रहे हैं। लगता है कि ओबामा ने अब तक अपने देश की शिक्षा का जायजा ले लिया और अपने देश को आगाह कर दिया कि देश की शिक्षा पद्धति में सुधार लाने की जरूरत है। इस तरह की चिंता हमारे देश के किसी नेता ने कभी व्यक्त नहीं की।

जिस देश में शिक्षा  को शिक्षाविदों की जगह दोयम दर्जे के नौकरशाह चलाएं, वहां कौन कह सकता है कि नेता शिक्षा के प्रति चिंतित हैं। हमारे नेता गाहे-बगाहे जिक्र कर दिया करते हैं। अमेरिका आज भी सबसे शक्तिशाली और अमीर देश है। उसके बावजूद ओबामा चिंतित है कि अमेरिका 100 वर्ष तक समृद्घिशाली और शक्तिशाली देश के छात्र अगर वीडियो गेम और टीवी में समय बिताएंगे तो हिंदी चीनी आ धमकेंगे।

कभी अमेरिका पीएचडी, इंजीनियर्स, वैज्ञानिक सबसे अधिक पैदा करता था, अब उसमें गिरावट आई है। जब शिक्षा की बात आती है तो वह दूसरे देशों से ऊपर नहीं है। दुनिया के देश प्रतिस्पर्धाधर्मी होते जा रहे हैं हमें भी अपनी गति बढ़ानी होगी। संदेश के साथ-साथ यह चुनौती भी है। हिंदुस्तान में चीन और अमेरिका से अधिक विश्वविद्यालय हैं। नए विश्वविद्यालय और आईआईटी खुल गए हैं या खुलने की प्रक्रिया में हैं। प्राइवेट मेडिकल कॉलेज, बिजनेस मैनेजमेंट संस्थान भी खुल रहे हैं। लेकिन बहुत कम ऐसे संस्थान हैं, जिनका उद्देश्य स्तरीय शिक्षा देना हो।

अधिकतर प्राइवेट संस्थाएं उन्हें आमदनी का जरिया बनाए हुए हैं। यहां लाखों की फीस देने के बाद ही प्रवेश मिल पाता है। इतनी फीस देकर शिक्षा हासिल करने वाले बाद में वही रास्ता अपनाएंगे, जिससे वे अपने लगाए गए धन को जल्द से जल्द हासिल कर लें। रातो-रात धन कमाने के बहुत से रास्ते हैं, इन्हीं में एक बड़ा रास्ता विदेश जाकर धन कमाने का भी है। और बहुत सारी संस्थाएं तो इन छात्रों को विदेशों की जरूरत के हिसाब से ही तैयार कर रही हैं, भारत की जरूरत के हिसाब से नहीं।

जिन समस्याओं से वे छात्र जूझते हैं, वे समस्याएं अधिकतर बाहरी देशों की होती हैं जो प्रोजेक्ट के रूप में वहां से आती हैं। इसलिए वे खपते भी वहीं हैं। ऐसे में ओबामा को ऐसा लगना कि हिंदी या चीनी आ रहे हैं अपने देश में बढ़ती बेरोजगारी की दृष्टि से भले ही ठीक है पर भारत के नजरिए से चिंताजनक है। हमारे यहां बच्चे होश संभालते नहीं, उन्हें पट्टी पढ़ाना शुरू कर दिया जाता है कि उन्हें मैनेजमेंट, इंजीनियरिंग या ऐसे ही किसी मोटी कमाई वाली स्ट्रीम को पढ़कर विदेश में जाना है।

मातृभाषा से विमुख करके पब्लिक स्कूलों में पढ़ाना, उनकी साहित्य संस्कृति और संवेदना की रीढ़ तोड़ना सबसे पहला काम होता है। मां-बाप यह तक जानने की कोशिश नहीं करते कि उनके बच्चे स्कूलों में क्या सीख रहे हैं। वे केवल टेस्ट कॉपियों में दिए गए नंबर देखकर उनकी गिटपिट सुनकर आश्वस्त हो जाते हैं कि बच्चा उनकी चाही दिशा में जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों के साथ जो नृशंस व्यवहार हो रहा है, मां-बाप के बुढ़ापे की लकड़ी तोड़ी जा रही है, उसकी चिंता न वहां की सरकार को है और न हमारी सरकार को।

बराक ओबामा साहब आपका यह कथन भले ही हमें अपने बच्चों की फिलहाल प्रशंसा महसूस कराता हो। हम कुछ समय हर्षित भी हो लें, पर वह आपके बच्चों को ईष्र्या से भरने के लिए काफी है। ऐसी बातों का भी आखिर में नतीजा वही होगा जो ऑस्ट्रेलिया में हो रहा है। उन्हें बचाने के लिए बहुत कुछ कहा और किया जाएगा पर अंतत: यही होगा कि उनका न शहीदों में नाम रहेगा न देशभक्तों में। जो लौटेंगे वे सपनों का मलबा लादे। आपका यह भाषण हमारे पक्ष में न होकर विरुद्घ है। ईर्ष्या ऐसी आग है, जो नजर नहीं आती पर धीरे-धीरे आधार को खाक कर देती है।

लेखक गांधीवादी साहित्यकार हैं।

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