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मर्यादा का उत्सव

यह हर किसी के लिए चिंता का विषय है कि हम जितना आधुनिक और सभ्य हो रहे हैं, हमारे अंदर उतनी ही असहिष्णुता पनप रही है। विकास के साथ-साथ क्रूरता भी बढ़ रही है। व्यवहार की जो मर्यादा थी, वह क्षीण हो रही है। यह मर्यादा एक-दूसरे के साथ मधुर संबंध की थी, पारिवारिक-सामाजिक मूल्यों की थी। मर्यादा सीधे तौर पर अनुशासन से जुड़ी रहती है। अनुशासन हमेशा दृष्टिकोणदेता है और सहिष्णुता को बढ़ाने में मदद करता है। लेकिन आज असहिष्णुता एक आदत बन गई है। उसके लिए तरह-तरह के तर्क दिए जा रहे हैं।

अपने बचाव में एक बात कही जाती है कि परिस्थिति ने असहिष्णु बना दिया। राजस्थान के एक जैन संत जयाचार्य का मत था कि असहिष्णु वह होता है जिसमें दूसरों की विशेषताओं और कमियों को सहने की क्षमता नहीं होती। वह न अनुकूलताओं को सह सकता है और न प्रतिकूलता को। यह भाव स्वयं उनके लिए खतरा तो है ही, दूसरे के लिए भी अच्छा नहीं है। वह स्वयं बेचैनी का जीवन जीता है और अकारण ही अनेक कष्टों को आमंण देता है। इसलिए जयाचार्य ने अपने गुरु आचार्य भिक्षु के कर्तव्य और अकर्तव्य के बारे में बनाए विधान को मर्यादा नाम दिया और मर्यादा महोत्सव मनाने की परंपरा शुरू की।

इस महोत्सव को बाकी दिवस या उत्सवों की तरह स्थापित करने की जोर-शोर से कोशिश चल रही है ताकि हर आदमी स्वयं के अंदर झंककर देखे कि कहां क्या गलत हो रहा है। पहले चरण में अगर मर्यादा व्यवहार के स्तर पर भी आती है तो न केवल वह दुश्मनी और ईष्र्या के भाव को कम करेगी, बल्कि अंत:परिवर्तन के लिए भी प्रेरित करेगी। यह कहा जाता है कि मर्यादा और सहिष्णुता के सहारे दूसरों की कमियों और विशेषताओं को सहा जा सकता है। सहने की क्षमता नहीं होने के कारण ही जाति, धर्म, विचार के झगड़े हो रहे हैं। अब तो पर्वो-त्योहारों, सामाजिक आयोजनों में भी मर्यादाएं टूट रही हैं। अगर मर्यादा को उत्सव बना दें तो वेलेंटाइन डे पर भी मर्यादा नहीं टूटेगी।

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  • Web Title:मर्यादा का उत्सव