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हार के इर्द-गिर्द

लोक लुभावन राजनीति में कठोर विचारधारा कितनी मददगार हो सकती है और कितनी बाधा बन सकती है, यह हमेशा से एक टेढ़ा सवाल रहा है। इसलिए भारतीय जनता पार्टी से यह उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि उसकी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की दो दिन की बैठक आसानी से ऐसे किसी फैसले पर पहुंच जाती जो बताता कि हिंदुत्व उसकी ताकत है या कमजोरी। वह भी तब, जब उम्मीदें तोड़ देने वाली हार के सदमें से पूरी तरह उबरी न हो और विचारधारा का मसला उठाने वाले नेताओं की दिलचस्पी भी इस मसले पर किसी गंभीर बहस के बजाए, इस बात में हो कि इस बहाने वे अपने विरोधियों को पटखनी कैसे दे सकते हैं।

पार्टी की बागडोर संभालने वाले ज्यादातर नेताओं की गर्भनाल अभी किसी न किसी तरह से हिंदुत्व की बात करने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से ही जुड़ी है, इसलिए यह उम्मीद पूरी तरह से व्यर्थ थी कि पार्टी हिंदुत्ववाद से नाता तोड़ लेगी और संघ से दूरी बना लेगी। यह जरूर हो सकता था कि पार्टी हिंदुत्ववाद के नाम पर सांप्रदायिक वमनस्य फैलाने की राजनीति के खिलाफ कोई दृढ़ संकल्प ले पाती। दो दिन की बैठक से जो खबरें छन कर आईं, वे ये तो बताती ही हैं कि इस मसले पर भारी बहस हुई। लेकिन नतीजे की कोई बात सामने नहीं आई।

जबानी जमा-खर्च के अलावा इस बैठक से जो एकमात्र कार्यक्रम सामने आया, वह इतना ही है कि पार्टी के नेता लालकृष्ण आडवाणी अब पूरे देश की यात्रा करेंगे। हर प्रदेश में जाएंगे और हार के कारणों को तलाशेंगे। एक तरह से यह पार्टी का नहीं पार्टी के नेता का कार्यक्रम है। इसके जरिये पार्टी के कार्यकर्ताओं को लामबंद करने और किसी मकसद की तरफ ले चलने का रास्ता कैसे निकलेगा यह अभी साफ नहीं है।

बैठक में आडवाणी ने यह भी कहा कि पार्टी को दूसरी, तीसरी और चौथी पांत का नेतृत्व तैयार करना चाहिए। लेकिन इसमें भी कोई नई बात नहीं है। जनता पार्टी से अलग होकर जब भाजपा बनी थी तो पहले ही भाषण में अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि ‘कमल खिल सकें इसके लिए जरूरी है कि उसे नए खून से सींचा जाए’। यह कोशिश जब इतने बरस में नहीं हुई तो एक हार के बाद इसके हो जाने की बहुत उम्मीद नहीं बंधती। हार के कारणों में सर खपाने के बजाए बेहतर होगा कि भाजपा एक समझदार और मजबूत विपक्षी दल के तौर पर अगले बजट सत्र की तैयारी करे। पार्टी का भविष्य भी आखिर में उसकी इसी भूमिका से तय होगा।

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