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इट हैपंस ओनली इन इंडिया

एक गाने का बोल है : ‘इट हैपंस ओनली इन इंडिया’। 26/11 को पाकिस्तानी आतंकवादियों ने हमारे देश के लोगों को बेरहमी से मारा। देश के होनहार फौजी और सिपाही शहीद हुए। एक आतंकवादी  जिन्दा पकड़ा गया। उसको जिंदा पकड़ कर हमने  क्या पाया? देश के करोड़ों रुपए खर्च हो रहे हैं। कई सिपाही उसकी सेवा  में लगे हैं। आखिर क्यों? कोई हिन्दुस्तानी पाकिस्तान में ऐसी हरकत करता पकड़ा जाता तो क्या वहां की सरकार उसकी ऐसी सेवा करती? हमारे देशवासी विदेशी अतिथियों को अतिथि देवो भव से नवाजते हैं। जबकि ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका में हमारे देशवासियों को पीटा जाता है मारा जाता है।
जगदीश कुमार खन्ना, नई दिल्ली

दिल्ली में नहीं है संचयिका
देश भर के सभी राज्यों के स्कूलों में बच्चों के बचत खाते की योजना ‘संचयिका’ चलती है, लेकिन दिल्ली के स्कूलों में ये योजना नहीं चल रही है। नवम्बर 2002 तक ये योजना केन्द्र सरकार के अधीन राष्ट्रीय बचत संगठन चलाता था। लेकिन उसके बाद इसे राज्य सरकारों के वित्त विभाग को हस्तांतरित कर दिया गया। दिल्ली के ज्यादा फीस वाले स्कूलों में तो बैंकों की शाखाएं हैं या उनके एक्सटेंशन काउंटर हैं, लेकिन सरकारी स्कूलों में ऐसी कोई सुविधा नहीं। इस तरह के स्कूलों में संचयिका बड़े काम की हो सकती है। सात साल से फाइलों में बंद पड़ी ये योजना फिर से शुरू हो जाए तो दिल्ली के सारे बच्चे सरकार के शुक्रगुजर रहेंगे।
अनंजय शर्मा, सरदार पटेल विद्यालय, नई दिल्ली

और भी हैं ठिकाने
दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिला लेने की चाहत में करीब 35 फीसदी छात्र अन्य राज्यों से आते हैं। हॉस्टल व रिहायशी सुविधा न मिलने पर वे  अक्सर कहते हैं ‘नगरों के तो नखरे बढ़ गए हैं’ कैम्पस के आसपास के क्षेत्रों में हाउस फुल हो गया है तो फिक्र क्यों? दिल्ली का दिल ‘मेट्रो’ आपकी समस्या का समाधान है। दिल्ली के सस्ते, शांतिप्रिय डीडीए के आवास मेट्रो स्टेशनों के पास ही हैं। इन क्षेत्रों में बिजली-पानी की अच्छी सुविधाएं हैं। किराए व बाजर भी सस्ते हैं। जेबखर्ची के लिए टच्यूशन के स्रोत भी हैं। यदि कैम्पस के पास घरौंदा न मिले तो इन क्षेत्रों में आपका स्वागत है।
 राजेन्द्र कुमार सिंह, रोहिणी, दिल्ली

एक अच्छा फैसला
सम्पादकीय ‘इतिहास का बोझ’ में सही लिखा है कि आधुनिक भारत में सामंती प्रतीकों के लिए जगह नहीं होनी चाहिए। कांग्रेस पार्टी ने राजसी प्रतीकों व गुजरे वक्त की राजसी उपाधियों से निजत पाने का जो फैसला लिया वह समय की मांग के बिल्कुल अनुकूल है। एक सुझाव यह भी है कि पद्मश्री, पद्मभूषण, पद्मविभूषण अथवा भारत रत्न जैसे नए युग के अलंकार भी नाम से पहले न लगाए जाएं, जैसे कि पद्मश्री फलां-फलां।
डॉ. आर. के. मल्होत्रा, नई दिल्ली

बाइकर्स
बाइकर्स की भरमार, चार-चार सवार
तूफानी रफ्तार, हमले को तैयार
शैतानी से प्यार, सबको डर बेशुमार
जनता लाचार, पड़ती मार पर मार
पकड़ से बाहर, क्या करेगी सरकार।
 वेद, नरेला, दिल्ली

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