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कहां चला तू चांद बता!

सौर ग्रह पर जीवन की संभावनाओं की अधिक से अधिक जानकारी एकत्रित करने के प्रयास में जुटे नासा ने चांद के पर्यावरण के विषय में गहन जानकारी जुटाने के लिए ल्यूनर रिकोनेसां ऑर्बिटर (एलआरओ) को सफलतापूर्वक लांच किया गया है। 23 जून को एलआरओ चांद पर पहुंच जाएगा।

मानवरहित एलआरओ अंतरिक्ष यान, चांद की कक्षा के चारों और  चक्कर लगाते हुए उसकी विशेषताओं व संसाधनों के बारे में सूक्ष्म जानकारियों को जुटाएगा और इसका विस्तृत नक्शा तैयार करेगा। एलआरओ का मुख्य फोकस चांद की सतह पर संभावित सुरक्षित लैंडिंग साइट्स का चयन करना, वहां मौजूद संसाधनों की पहचान करना तथा किस तरह चांद की किरणों मानव शरीर को प्रभावित करती हैं, आदि पर रहेगा।

चांद के पर्यावरण को और समझने की कोशिशों में चांद की ओर बढ़ रहा एक अन्य यान ल्यूनर क्रेटर ऑब्जव्रेशन एंड सेंसिंगा सेटेलाइट (एलसीआरओएसएस) है। एलसीआरओएसएस कुछ ही माह में चांद के दक्षिणी ध्रुव के शकल्टन क्रेटर में प्रवेश करते हुए ऐसी सामग्री एकत्रित करेगा, जिन पर पिछले दो अरब वर्षो से रोशनी नहीं पड़ सकी है।

इसका उद्देश्य चांद पर पानी की मौजूदगी को बताने वाले तत्वों को खोजना भी है। नासा की कोशिश चांद की सतह पर पानी की मौजूदगी की खोज करके 2020 तक अमेरिकी अंतरिक्षयात्रियों के चांद पर योजनाबद्ध आवागमन को संभव बनाना है।

द बिग व्हैक
वैज्ञानिकों की अवधारणा के अनुसार चांद की उत्पत्ति एक बड़ी टक्कर का परिणाम थी, जिसे जियांट इंपैक्ट अथवा बिग व्हैक कहते हैं। परिकल्पना के अनुसार सूर्य और सौरमंडल की उत्पत्ति के कुछ समय बाद लगभग 4.6 अरब वर्ष पहले मंगलग्रह के सामान किसी बड़े आकार की चीज (जिसे कई बार थिया कहा जता है) की पृथ्वी से टक्कर हुई। इसके कारण बड़े पैमाने पर पृथ्वी के कणों व अन्य चीजों के मिश्रण का एक वाष्पीकृत बादल उत्पन्न हुआ जो पृथ्वी की कक्षा में आ पहुंचा। यह बादल ठंडा होने पर संघनित होकर ठोस छोटे गोल घेरे या रिंग में बदल गया, बाद में इसके एक साथ इकट्ठे होने पर चांद का निर्माण हुआ।

पृथ्वी से हुआ चंद्रोदय
हर रोज, हालांकि किसी एक समान समय पर नहीं, चांद सूरज व अन्य तारों की तरह पूर्व से उदय होकर पश्चिम में छिप जाता है। जिसका कारण है : पृथ्वी पूर्व की ओर अपनी धुरी पर घूमते हुए खगोलीय वस्तुओं को अपनी और आकर्षित करती है और उन्हें पीछे की ओर धकेलती है। चांद भी पृथ्वी के चारों ओर एक चक्कर लगभग 29.5 दिनों में पूरा करता है। आसमान में उत्तरोतर पूरब की ओर चलता है, हालांकि यह किसी समय विशेष पर देखने पर  दृष्टिगोचर नहीं होता। इसी कारण हर रोज चांद दिन छिपने के औसतन 50 मिनट बाद उदय होता है। इससे यह भी जानकारी मिलती है कि क्यों चांद कई बार शाम के समय उदय होकर रात में दिखाई देता है और कई बार दिन में भी दिखाई देता है।

गुरुत्वाकर्षण बहुत कम है
चांद, पृथ्वी के आकार का सिर्फ 27 प्रतिशत है और उसका भार भी कहीं कम है। चांद का तुलनात्मक गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी के मुकाबले 1/6 ही है। यदि आप चांद की सतह पर कोई चट्टान फेंकते हैं, तो यह पृथ्वी की तुलना में धीमी गति से नीचे आएगी। यदि आपका वजन पृथ्वी पर 150 पौंड है, तो चांद पर यह वजन घटकर 25 पौंड हो जाएगा।

बड़ा और छोटा चांद
पृथ्वी के चारों ओर चांद की कक्षा गोलाकार ना होकर अंडाकार है जिस कारण प्रत्येक कक्षा में पृथ्वी की केंद्र से और चांद की केंद्र से दूरी अलग-अलग होती है। ऐसे में जब चांद पृथ्वी के सबसे नजदीक (पेरीजी) होता है, वह दूरी 363,300 किलोमीटर होती है और पृथ्वी से सबसे अधिक दूर होने पर यह दूरी (एपोजी) 405,500 किलोमीटर होती है। जब चांद पृथ्वी से सबसे अधिक दूरी पर होता है, उस समय पूरा चंद्रमा अन्य पूर्ण चंद्रों की तुलना में 14 प्रतिशत अधिक बड़ा और 30 प्रतिशत अधिक चमकदार होता है। कुछ का मानना है कि जब चंद्रोदय रात के समय देर में होता है, तब वह अधिक बड़ा दिखाई देता है, जो एक भ्रम है। इसे आप इस तरह से भी जांच सकते हैं। आप एक नए रबर (इरेजर) को कुछ दूरी पर रखें। शाम को जब चांद उदय होता है उस समय उसका आकार बड़ा दिखाई देता है, रबर के उस परीक्षण को फिर दोहराएं जब देर शाम चांद अधिक ऊंचाई पर और उसका आकार छोटा प्रतीत हो। दोनों में नतीज एक सा होगा।

धब्बेदार इतिहास
चांद पर मौजूद गड्डे इसके इतिहास की जनकारी देते हैं। वहां पर कोई वातावरण नहीं है और चांद के अंदर लगातार छोटी-मोटी गतिविधियां होती रहती हैं। चंद्रमा के गड्डों को देखने के बाद वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला कि लगभग 4 अरब वर्ष पहले उस पर (और पृथ्वी पर) भारी उल्का वर्षा हुई। वर्तमान सोच के अनुरूप माना जा रहा है कि यहां जीवन उसके काफी देर बाद तक रहा होगा, यदि जीवन प्रक्रिया उस समय अस्तित्व में आई होगी।

चंद्रमा गोल नहीं
चंद्रमा गोल नहीं है, इसका आकार अंडाकार है। यदि आप बाहर जाएं और चांद को देखें तो आपको ऐसा लगेगा कि इसका एक किनारा आपकी दिशा में मुंह किए हुए है। चांद का केंद्रीय भार उपग्रह के भौतिक केंद्र में नहीं है। यह केंद्र से लगभग 2 किलोमीटर दूरी पर स्थित है।

मूनक्वेक्स, सावधान 
अपोलो एस्ट्रोनॉट्स ने चंद्रमा पर भ्रमण के दौरान सिस्मोमीटर का प्रयोग किया था। उन्होंने खोज कि ग्रे ऑर्ब पूरी तरह से मृत जगह नहीं है। छोटे मूनक्वेक, सतह से कई मील नीचे उत्पन्न होते हैं। इनका कारण पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि संभवत: चंद्रमा का केंद्र है, जो गर्म और आंशिक रूप से गला हुआ है, जैसा कि पृथ्वी का कोर। लेकिन नासा के लूनर प्रॉस्पेक्टर स्पेसक्राफ्ट द्वारा दिखाए गए डाटा के आधार पर चंद्रमा की कोर छोटी है, जो अंदाजन इसके द्रव्यमान का दो से चार प्रतिशत होता है। पृथ्वी के मुकाबले यह छोटी है।

ज्वार की वजह भी चांद
सामान्यत: पृथ्वी पर ज्वार आने का मुख्य कारण चंद्रमा ही होता है (सूर्य का प्रभाव कम पड़ता है)। चंद्रमा का गुरुत्व पृथ्वी के समुद्रों को आकíषत करता है। पृथ्वी जब नीचे की तरफ चक्रण करती है, तब उच्च ज्चार चंद्रमा की दिशा में संरेखित हो जते हैं। दूसरे उच्च ज्वार ग्रह की विपरीत दिशा में आते हैं, क्योंकि गुरुत्व की वजह से पृथ्वी चंद्रमा की तरफ आकíषत होती है। जब चंद्रमा अपने पहले या अंतिम पखवाड़े में होता है, छोटे ज्वार भाटा आते हैं। जब चंद्रमा पृथ्वी के नजदीक (पेरिजी) होता है। स्प्रिंग ज्वार ऊंचे होते हैं और इन्हें पेरिजन स्प्रिंग ज्वार कहते हैं।

बाय, लूना !
आप जब इस लेख को पढ़ रहे होंगे, तो चांद दूर खिसक रहा होगा। प्रत्येक वर्ष चंद्रमा पृथ्वी की कुछ घूर्णन ऊर्जा चुरा लेता है। इस ऊर्जा के इस्तेमाल से वह खुद को धक्का देकर अपनी कक्षा में 4 से.मी. ऊंचा स्थापित कर लेता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि जब 4.6 मिलियन वर्ष पहले ये अस्तित्व में आया था, तब चांद पृथ्वी से 22,530 कि.मी. दूर रहा होगा। वर्तमान में यह तकरीबन 450,000 कि.मी. दूर है। पृथ्वी का घूर्णन लगातार धीमा होता जा रहा है, इसकी वजह से हमारे दिन लंबे होते जा रहे हैं।

‘डार्क साइड’ नहीं
अब तक जो शायद आपने सुना है, उसके विपरीत, चांद की कोई डार्क साइड नहीं होती। हालांकि, एक साइड (फार साइड) होती है, जो पृथ्वी से दिखाई नहीं देती। इसका कारण है : बहुत पहले पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव के कारण चांद की अपनी धुरी पर घूर्णन की गति धीमी हुई। जैसे ही चांद के घूर्णन की यह धीमी गति, इसके कक्षा की अवधि (वह समय जिसमें चांद पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाता है) के बराबर हुई, तो यह प्रभाव हमेशा के लिए स्थिर हो गया।  इसीलिए चांद एक समान समयावधि में ही पृथ्वी के चारों ओर तथा अपनी धुरी पर चक्कर लगाता है। यही वजह है कि हमें हमेशा चांद की एक ही सतह ही दिखाई देती है।

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