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निर्माण के आठ वर्षो में ही आयी खराबी

पिछले 25 वर्षो से सेतु पार करने वाले भारी एवं हल्के वाहनों से सवा अरब रूपए से ऊपर की कर वसूली हुई है। पर रख रखाव पर खर्च मामूली है। साल दर साल महात्मा गांधी सेतु की मरम्मत हुई होती ऐसी नौबत नहीं आती।

रख रखाव के मद में अलग से राशि का उपबंध किया होता तो पुल के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह ही नहीं उठता। महात्मा गांधी सेतु के निर्माण के मात्र आठ वर्ष बाद ही वर्ष 1991 में पहली खराबी दिख गई थी। उस समय ही पुल के सेन्ट्रल हींज बेयरिंग में खराबी शुरू हो गई थी। लेकिन पांच वर्षो के बाद वर्ष 1996 में राष्ट्रीय उच्च पथ के अन्तर्गत इस पुल के अधिसूचित होने के बाद ही पुल की खराबी को जानने के लिए स्तुप कंसलटेंट को जिम्मेवारी दी गई।

उसने पुल की खराबी को ठीक करने के लिए तत्काल 30 करोड़ रुपए खर्च करने की बात कही। पुल के खराब हो गए स्पैनों को दो फेज में ठीक करने का प्रस्ताव बनाया। पुल के पुनर्निर्माण पर पहले फेज में 6 करोड़ और दूसरे फेज में 24 करोड़ रुपए खर्च होना था। पर काफी हो-हल्ला के बाद वर्ष 2001 में पुल के पहले दो और बाद में चार स्पैनों को ठीक करने के लिए मात्र 4 करोड़ की राशि स्वीकृत हुई।

बाद में वर्ष 2004 में और 22.25 करोड़ रुपए पुल की मरम्मत के लिए स्वीकृत हुए। वर्ष 2006 में 6 करोड़ की राशि से सेतु के पश्चिमी लेन के चार स्पैन में प्री स्ट्रेसिंग कार्य शुरू हआ। सूबे के वर्तमान पथ निर्माण मंत्री द्वारा दिल्ली में अनशन की घोषणा करने के दबाव के बाद केन्दीय भूतल परिवहन मंत्रालय 38 करोड़ रुपए के इस्टीमेट के विरुद्ध मात्र 13 करोड़ रुपए खर्च करने को तैयार हुआ है जिसपर काम चल रहा है।

फिलहाल कुल 45 करोड़ रुपए की मरम्मत कार्य चल रहा है। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि वर्ष 1999 में ही राष्ट्रीय उच्च पथ के विशेषज्ञों ने सेतु की मरम्मत के निर्देश दिए थे और कहा था कि सेतु को बिना मरम्मत किए यातायात चालू रखना खतरे से खाली नहीं है।

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