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उर्दू मीडिया : ईरानी चुनाव में अमेरिकी दिलचस्पी

‘ईरानी चुनाव’ शीर्षक से ‘अनवारे कौम’ ने अपनी सम्पादकीय में लिखा कि ईरान में अमीर हुसैन मुसावी की हार अमेरिका की पराजय है क्योंकि अमेरिका राजनैतिक स्तर पर यहां वातावरण को बदल रहा था। अपनी समर्थित सरकार लाकर वह ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर प्रतिबंध लगा देता और इजराइल पर होने वाला हमला हमेशा-हमेशा के लिए टल जाता या यह भी संभव था कि ईरान समर्थक हिलबुल्ला जो लेबनान में रहते हैं, इनकी सहायता फिर ईरानी सरकार की ओर से न होती और इस तरह इजराइल को आसानी से मौका मिल जाता कि वह दक्षिण लेबनान पर अपना कब्ज जमा ले। निश्चय ही अमेरिका अब ईरान पर हमला तो नहीं कर सकता इसलिए उसकी पूरी कोशिश दबाव की होगी कि वह परमाणु हथियार न बनाए।

‘ईरान के चुनावी नतीजों पर अमेरिका को चिंता क्यों’ के शीर्षक से दैनिक ‘सहाफत’ ने लिखा है कि अमेरिका की तरफ से ईरान के राष्ट्रपति ने चुनावी नतीजों को मानने से इंकार करते हुए कहा गया है कि चुनाव में धांधली का जयज लिया ज रहा है। अमेरिका की विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन ने राष्ट्रपति अहमदीनेजद की दोबारा कामयाबी को निरस्त कर दिया है। यह अजीब बेवकूफी वाली बात है।

ईरान की जनता अहमदीनेजद को कामयाब बना कर अपना फैसला दे चुकी है। ईरान के नतीजों को मान्यता देने वाला अमेरिका कौन होता है। उसे यह अधिकार किसने दिया कि वह चुनाव में धांधली का जयज ले। अमेरिका द्वारा जिस तरह अहमदीनेजद की कामयाबी को निरस्त किया गया, उससे ऐसा महसूस होने लगा जैसे अमेरिका में बुश का दौर वापस आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के मुस्लिम संबंधी भाषण में फिलस्तीन स्वतंत्र राष्ट्र की स्थापना की बात पर इजराइली प्रधानमंत्री नेतन याहु ने बिना सैनिक शक्ति के फिलस्तीनी राष्ट्र के सुझव पर मुस्लिम जगत में जो प्रतिक्रिया हुई उसे उर्दू समाचार पत्रों ने प्रमुखता से स्थान दिया हैं।

‘राष्ट्रीय सहारा’ ने अपने सम्पादकीय ‘शस्त्र प्रस्तुति इजराइल का हरबा (चाल)’ के शीर्षक से लिखा है कि इजराइली प्रधानमंत्री का बयान बदनीयती पर आधारित है। बयान को छल, धोखा, शांति स्थापना को निरस्त करने का प्रयास बताते हुए अखबार ने लिखा है कि अमेरिका और पश्चिमी देशों ने इजराइल के सुझाव का समर्थन किया है लेकिन सच्चाई यह है कि इजराइली सुझाव स्वतंत्र फिलस्तीन के नाम पर फिलस्तीनियों को धोखा देने और मध्य पूर्व में अपना फौजी वर्चस्व बनाए रखने का ऐसा हथियार है जिस पर यदि अमल होता भी है तो इससे न तो फिलस्तीनियों के स्वतंत्र राष्ट्र की स्थापना का सपना पूरा होगा और न ही इस क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित हो सकेगी।

‘सह रोज दावत’ ने लिखा है कि इजराइल ने अमेरिका की वह अपील निरस्त कर दी जिसमें फिलस्तीनी क्षेत्र के पश्चिमी किनारे पर यहूदी बस्तियों के विस्तार को बंद करने की बात कही गई थी। फिर फिलस्तीनियों के सामने ऐसी-ऐसी शर्ते रख दीं, जिसे न तो फिलस्तीनी कुबूल करेंगे और न ही फिलस्तीनी समस्या का समाधान निकल सकेगा।

इजराइल फिलस्तीनी राष्ट्र की स्थापना पर राजी तो हुआ है, लेकिन यह कहां बनेगा, यह नहीं बताया। केवल यह कहा कि यरुशलम विभाजित नहीं होगा। अविभाजित यरुशलम ही इजराइल की राजधानी बनेगी जबकि फिलस्तीनी पूर्वी यरुशलम को अपनी राजधानी बनाना चाहते हैं।  अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इनके इस दावे को सही बताया है और इजराइल की हठधर्मी को नाजयज बताया है।

इजराइल ने दूसरी बड़ी शर्त यह रखी है कि लाखों फिलस्तीनी विस्थापितों को इजराइल के अंदर अपने पुरखों की भूमि पर आकर बसने का हक नहीं दिया जएगा। यह कहां जएंगे और कहां आबाद होंगे, इस बारे में कुछ नहीं बताया गया है।
पश्चिम बंगाल में पहले नंदीग्राम और अब लालगढ़ की घटना ने यह साबित कर दिया कि देश के ‘विकासशील राज्य में एनारकी’ जड़ पकड़ रही है और यह सब कुछ कम्युनिस्टों के सत्ता में रहते हो रहा है।

दैनिक ‘प्रताप’ ने इस पर अपने सम्पादकीय में लिखा है कि यह वही बंगाल है, जो कम्युनिस्टों के आने से पहले देश का सबसे बड़ा औद्योगिक राज्य समझ जता था। दवाओं के कई बड़े-बड़े कारखाने यहां थे और दूसरी भी कई चीजें बंगाल में सबसे ज्यादा बनती थीं। लेकिन दुर्भाग्य समझिए जिस दिन से कम्युनिस्टों की यहां सत्ता आई है, राज्य की गिरावट शुरू हो गई। जितने विचारों के कम्युनिस्ट थे, वह सबके सब पूंजीपति और कारखानों के मालिकों के दुश्मन थे। इनके कारोबार को खत्म कराने के लिए आए दिन हड़ताल कराते थे, जिसका नतीजा यह हुआ कि पूंजीपति राज्य को छोड़कर दूसरे क्षेत्रों में जाने पर मजबूर हो गए।

लेखक स्तंभकार हैं।

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