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महात्मा दीन दरवेश

महात्मा दीन दरवेश मानव-कल्याण एवं मानव-प्रेम में विश्वास करते थे। उन्हें जात-पांत से कुछ लेना-देना नहीं था। मुसलमान और हिन्दू की ईश्वर भक्ति में वह कोई भेद न करते थे। वह केवल ईश्वर की बंदगी में विश्वास करते थे। उसका कोई धर्म नहीं होता, वह पंडित नहीं होता, वह मौलवी नहीं होता। एक कविता में दीन दरवेश ने कहा है:  बंदा कर ले बंदगी पाया नर तन सार।

 जो अब गाफिल रह गया आयु बहे झखमार।
 आयु बहे झखमार, कृत्य नहीं नेक बनायो।
  पाजी बेईमान कौन विध जग में आयो।
कहत दीन दरवेश फंस्यो माया के फन्दा।
पाया नर तन सार बंदगी कर ले बंदा।

दीन दरवेश का जन्म गुजरात के पाटन ग्राम में हुआ था। इनके अनुयायी ‘दरवेश पंथी’ कहलाते हैं। बचपन में दीन दरवेश की शिक्षा मुल्ला-मौलवियों के यहां हुई। युवा हुए तो उन्होंने सूफी-फकीरों का साथ किया। उनके सत्संग से वह प्रेममार्गी संत विचारधारा के अनुयायी बन गए। इसके बाद भी जिस परमात्मा की खेज में आत्मा भटक रही थी, वह न मिला। तब वे तीर्थाटन के लिए निकल पड़े। उन्होंने वाराणसी, मथुरा, वृन्दावन, प्रयाग,श्रीनाथजी का नाथद्वारा सब जगह की यात्रा की।

उस समय समाज में चारों ओर फैले पाखंड से, दीन दरवेश का मन भक्ति की ओर से विरक्त हो गया। इसी विरक्ति के आलम में दीन दरवेश को एक कबीरपंथी महात्मा मिले। उनकी साधना और भक्ित के आगे दीन दरवेश नतमस्तक हो गए। उन्हीं महात्मा ने दीन दरवेश को दीक्षा दी। फिर तो दीन दरवेश एकान्त में साधना करने लगे और उन्हें सत्य का दर्शन हुआ। उन्होंने ‘दरवेश-पंथ’ की स्थापना की।

हिंदू, मुसलमान- किसी में कोई भेद न माना जता था- दरवेश पंथ में। दीन दरवेश ने इसके बाद भी भ्रमण किया था और दरवेश पंथ का प्रचार किया था। उनकी काव्यमयी भक्ति-पदावली बेहद प्रभावशाली थी और उसने तत्कालीन जन समाज पर बड़ा प्रभाव डाला था।

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