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फटाफट क्रिकेट दर्शन

लोहिया जैसे समाजवादी नेता-विचारक कुछ तो भी बोलते रहे, जिन्दगी भर। आज नतीज सिफर का सिफर है। भाषा में अंग्रेजी, सियासत में परिवार, खेलों में क्रिकेट का हाहाकार बढ़ता ही जा रहा है, समय के साथ। अब तो आलम यह है घर-घर, गांव-गांव में ‘किरकेट’ है और हर पान की दुकान पर पॉलटिक्स। पान की दुकान के पिकासो, पीक से सड़क, फर्श, दफ्तर, बाद में रंगते हैं, पॉलटिक्स पर प्रवचन पहले करते हैं। मुल्क कभी क्रिकेटमय है, कभी चुनावमय। दोनों कभी शौक रहे होंगे, आजकल तो राष्ट्रीय लत की हैसियत है उनकी। मैदान-मैदान में क्रिकेट है, बूथ-बूथ पर वोट।

दोनों पूरे साल चलते ही रहते हैं। ज्ञानी बताते हैं कि इतना विशाल देश है। बाढ़, सूखा, भुखमरी, हत्या, आत्महत्या, अपहरण, आतंक, आंदोलन, कहीं न कहीं, होना ही होना। चुनाव और क्रिकेट भी। इलैक्शन में हमें कोई रुचि नहीं है। कोई सरकार आए, कोई जए, हमें और हमारे ऐसों को क्या फर्क पड़ना है? अपन सरकार के साबके से कतराते हैं। फिर भी जीवन में चोर, लीडर और सरकार के कोई कब तक बचेगा? अपना सरकार से सीमित सम्पर्क का एक ही निष्कर्ष है। सुशासन, करप्शन का मुस्तकिल मुखौटा है।

रास्ते में चलते-चलते हम क्रिकेट का सोचते हैं। हमारे देखते-देखते, पहले साइकिल पर ट्रांजिस्टर लाद कर लोग कमैन्टरी सुनते थे, अब सैलफोन पर स्कोर देखते हैं। क्रिकेट का क्रेज भी, करप्शन सा, बढ़ता ही ज रहा है, दिनों दिन। कभी पांच दिन के टैस्ट का युग था। खिलाड़ी दौड़ते कम, चलते ज्यादा थे। बॉलर टहलते आते गेंद फेंकने। दर्शक बीच-बीच में झपकी ले लेते। जीवन में अहिंसा का प्रभाव था और खेल में भी। बॉलर अम्पायर से अपील भी करते बल्लेबाज के खिलाफ तो दबी जुबान। जैसे माफी मांग रहे हों बल्लेबाज से कि ‘भया! क्षमा करना, जो गेंद बल्ले के बजए पैर से टकरा गई।’ जो विदेशी टीम आती, वह हमेशा भारत की मेहमान-नवाजी के चलते जीत के वापस जाती।

क्रिकेट का मिजाज इधर, बदला है। समाज में हिंसा बढ़ी है, क्रिकेट में आक्रामकता। अब गेंदबाज बल्लेबाज को ऐसे घूरता है, जैसे चबा जाएगा। अपील-इस जोरदार अंदाज से की जाती है कि कमजोर अम्पायर टें बोले। लगता है कि यह क्रिकेट का मैदान नहीं, कुरुक्षेत्र का युद्धक्षेत्र है! टैस्ट के पारम्परिक युद्ध पांच दिन चलते थे, और जोड़ अक्सर बराबरी पर छूटती। खिलाड़ी गुनगुनाते। ‘तुम्हारी भी जय जय, हमारी भी जय जय, न तुम जीते, न हम हारे।’ आज न्यूक्लियर युग है। इस में निर्णायक दो-दो हाथ करने को बीस ओवर ही काफी हैं। विज्ञान ने बर्बादी और विनाश के भयंकर हथियार ईजाद किए हैं और तुरंत मनोरंजन के भी!

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