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गुमशुदा मानसून

मौसम विभाग का बस इतना ही कहना है कि 20 मई को जो मानूसनी बादल अंडमान के आसमान पर घुमड़े थे, अब वे गायब हो चुके हैं। आइला नाम का तूफान उन्हें ऐसे ले उड़ा कि अब अगले एक हफ्ते तक मानूसन की वापसी की कोई संभावना नहीं है।

वैसे बरसाती बादलों को लाने वाले मानसून का लेट हो जाना कोई नई बात नहीं है। पांच साल पहले भी ऐसा ही हुआ था। यह ठीक है कि मानसून अगर लेट होता है तो कृषि पैदावार में भी कुछ कमी आती है। लेकिन यह ज्यादा बड़ी बात नहीं है, क्योंकि देश के कृषि क्षेत्र का भौगोलिक विस्तार इतना ज्यादा है कि कुछ एक जगह फसल खराब हो जाने पर भी हालात पर बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ता।

यहां तक कि दो दशक पहले जब देश में शताब्दी का सबसे बड़ा सूखा पड़ा था, तब भी अकाल की नौबत नहीं आई थी। समस्या कुछ दूसरी जगहों पर है। केंद्र सरकार परेशान है कि अगर खरीफ की फसल खराब होती है तो गरीबों को हर महीने सस्ती कीमत पर 25 किलो अनाज देने के उसके वादे का क्या होगा।

फिर यह खतरा भी है कि खाद्यान्न की कीमत पहले से बाजर में काफी ज्यादा है और उपज कम होने से इसमें और ज्यादा बढ़ोत्तरी को रोक पाना मुमकिन नहीं होगा। असर जल्द ही कृषि उपज के वायदा बाजरों में भी दिखने लगेगा। इसके अलावा मंदी के तमाम झटकों के बाद किसी तरह संभलने के बाद शेयर बाजर के पांव मानसून लेट होने की खबर से ही लड़खड़ाने लग पड़े हैं। हो सकता है कि मानसून बाद में सामान्य हो जाए और अभी जो कम उपज के खतरे दिख रहे हैं, वे बाद में सही साबित न हों।

लेकिन यह खबर उस समय आई है, जब हम विश्वव्यापी मंदी के एक बुरे दौर से गुजर रहे हैं, और इससे उबरने की उम्मीदें हमने जिन चीजों पर खड़ी की हैं, उनमें एक अच्छा मानसून भी है। एक बड़े सूखे के बाद, पिछले दो दशके से मानसून मोटे तौर पर सामान्य ही रहा है। लेकिन हम यह मानकर नहीं बैठ सकते कि यह हमेशा सामान्य ही रहेगा। खराब मानूसन की खबर सिहरन इसलिए बन जाती है, क्योंकि मानसून की कमी-बेशी से निपटने के आपातकालीन उपाय हमारे पास बहुत कम हैं। कृषि को मानसून के विकल्प देना हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।

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