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क्या ये नशामुक्ति अभियान है?

देश को नशामुक्त करने के अभियान की शुरुआत तो हो गई है। पर उन लोगों का क्या करें जो सबवे, पार्को इत्यादि में स्मैक का आनंद उठा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि यह केवल छोटे या अविकसित इलाकों की कहानी है, बल्कि ये तो दिल्ली के सबसे भीड़भाड़ व पॉश इलाकों की गाथा है। कनॉट प्लेस के सबवे में आसानी से ऐसे लोग देखने को मिल जाते हैं और इसमें केवल बड़े आयु वर्ग के ही नहीं अपितु 12-13 वर्ष तक के नाबालिग बच्चे भी होते हैं। क्या सरकार नशामुक्त अभियान चलाने का ढोंग कर रही है?
आरती टैगोर, जमिया, नई दिल्ली

स्वाइन फ्लू पर सतर्कता
स्वाइन फ्लू से पीड़ित रोगियों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ते जना एक खतरनाक संकेत है। विदेशी, खासकर अमेरिका से आने वाले जो इस रोग से पीड़ित पाए गए हैं, उन्हें अस्पतालों में दाखिल कराया गया है, लेकिन खबरों के अनुसार ऐसे कुछ रोगी अस्पतालों से ही लापता हो गए। यह गंभीर मामला है। ऐसे लोग इस रोग को फैलाने में प्रमुख कारण होंगे। सरकार स्थिति नियंत्रण में होने का पूरा दावा कर रही है, किन्तु जो काम किए जाने चाहिए उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया जा रहा।
इन्द्र सिंह धिगान, दिल्ली

एक-दूसरे का सहारा बनें
पूर्वी और दक्षिण पूर्वी एशिया के लगभग सभी देश जिनमें चीन और भारत भी शामिल हैं, या तो प्राकृतिक आपदाओं, भूकपं, बाढ़, महामारी आदि से प्रताड़ित हैं या आतंकवाद, नस्ली भेदभाव, महंगाई, गृहयुद्ध की पीड़ा से तार-तार हो रहे हैं। भारत व चीन जसे देश भले ही  आंकड़ों की दुनिया में 9 से 15 प्रतिशत आर्थिक विकास में हों, किंतु सामाजिक, राजनीतिक व लोकतांत्रिक रूप से अभी भी सशक्त नहीं हैं। जरूरत है कि चीन, भारत व पाक आपसी वमनस्य व कटुता को त्याग कर एक-दूसरे का सहारा बनें।
रवि गुप्ता, सेक्टर-6, नोएडा

आत्मचिंतन से बेहतर..
संघ परिवार भाजपा की हार के बाद मुरझाए कमल को खिलाने के लिए रोड मैप तैयार कर ही रहा था कि पार्टी में बगावत छिड़ गई। संघ ने भी साफ कर दिया है कि यदि भाजपा से अब न संभल रहा हो तो उतार दे हिंदुत्व का चोला। पार्टी आत्मचिंतन करने का जो ढोंग कर रही है उससे भाजपा के मुरझए कमल में जान पड़ने वाली नहीं। अब हिंदुत्व का ढोल पीटने से पार्टी जिंदा नहीं हो सकती। समझ में नहीं आता कि पार्टी अब  क्यों स्वीकार करना नहीं चाहती कि आडवाणी युग अब समाप्त हो चुका है।
अनूप आकश वर्मा, नई दिल्ली

महिलाओं की भागीदारी
खेद है कि हमारे देश में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों के मुकाबले बहुत कम है। पड़ोसी देश श्रीलंका में अधिकांश बैंकों, बसों, मेडिकल, टेलीफोन, रेल सेवा आदि में 30 प्रतिशत से ज्यादा महिलाकर्मी हैं। इसी प्रकार चीन में कामकाजी महिलाओं की संख्या का अनुपात 70 प्रतिशत तक है। सरकार से अपील है कि वह इनमें महिलाओं की भागीदारी प्रदान कराएं। एयर होस्टेस की तरह सरकारी बसों में भी कंडक्टर के पद पर महिला की भूमिका लाभदायक होगी।
कृष्णमोहन गोयल, अमरोहा

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