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बाप रे बाप! आज के पॉप्स

बाप रे बाप! आज के पॉप्स

‘अब पापा पहले के जितने खडूस नहीं रहे, वे बात-बात पर डांट लगाते नहीं दिखते, न ही पापा के घर आते ही वातावरण में गंभीरता छा जाती है।’ खुद पापा बन चुके 40 साल के प्रवक्ता विकास स्वीकारते हैं। वे मानते हैं कि जब उनके पिताजी का घर में राज चलता था, तो किसी डरावने ख्वाब की तरह उनको याद किया जाता था। माँ रोजाना सब बच्चों को यही धमकी देती थी कि पापा के आने पर सबकी शिकायत होगी और वे जमकर पिटाई करेंगे। विकास की उम्र का हर शख्स इस सच को स्वीकारने लगा है कि ‘पापा’ होने के मायने तेजी से बदल रहे हैं।
आज के पिता का चरित्र और उनका व्यवहार पुरानी पीढी की तरह नीरस और डरावना नहीं रहा। चूंकि समूचा समाज जबर्दस्त बदलाव के दौर से गुजर रहा है, रिश्तों में सघनता आई है। संयुक्त परिवारों के टूटने और परिवारों के न्यूक्िलयर रूप के कारण मम्मी की तरह ही पापा भी बच्चों के काफी करीब आ रहे हैं। उनमें पहले जैसा संकोच नहीं रहा जो परिवार के बड़े के आगे अपने बच्चे से बात करने की इजाजत भी नहीं देता था। न ही बच्चों को धमकाने और उनसे दूरी बनाए रखने को बुरा ही मानता था। वह अब बदल चुका है। 70 साल के आेमकार मानते हैं कि उन्होंने अपने पिता को कभी आंख उठाकर भी नहीं देखा, जवाब देने की तो वह कभी सोच भी नहीं सके। उनके समय में पिता तक अपनी बात पहुंचाने का जरिया माँ ही होती थी। अब जब वह अपने पोते-पोतियों को अपने पिता के साथ लाडम् करते देखते हैं तो अटपटा लगता है। वह कहते हैं- बुरा सा तो लगता ही है। कोई बाप के मुंह ऐसे लगता है। उनके समय में बच्चों के भीतर घर के बडमें का भय बिठाए रखने की प्रवृत्ति थी। बच्चों की मनोभावनाओं की कद्र तब बिल्कुल नहीं हुआ करती थी। हालांकि वह स्वीकारते हैं कि यह स्थिति उनको भी अच्छी लगती है, बस थोडम खटकती है। जबकि बुजुर्ग आेमकार का अधेडम् बेटा मानता है कि वह अपने बच्चों के साथ रोज थोडम्ी चुहल न कर ले तो उसका दिल ही नहीं भरता। अभी अपने यहां तो घर संभालू पापा का प्रचलन नहीं है, पर जिन समाजों में होम मेकर पिता हैं और मम्मी ऑफिस गोइंग, उनके बच्चों में जबरदस्त
मनोवैज्ञानिक बदलाव नजर आ रहे हैं। असल मायने में वे स्त्री सशक्ितकरण के दरम्यान जी रहे हैं और औरतों को सम्मान का दर्जा देने में कोई चूक नहीं कर रहे।

बाल विशेषज्ञ भी यही सलाह देते हैं कि अपने बच्चों के साथ बिल्कुल दोस्ताना संबंध रखें। अनुशासन की जगह कोई नहीं ले सकता, पर आज की टाइट लाइफ स्टाइल और सिकुडम्ते सामाजिक परिवेश में बच्चों का अपने पिता से भावनात्मक लगाव होना अति आवश्यक होता जा रहा है। अध्ययनों में देखा भी गया है कि पिता के साथ दोस्ताना व्यवहार रखने वाले बच्चों का आत्मविश्वास अधिक होता है। जबकि जो बच्चे अपने पापा से दूर होते हैं, जिनके पिता होते नहीं या ऐसे मधुर संबंध नहीं बन पाते उनमें रिश्तों को लेकर उपेक्षा की भावना घर कर जाती है। वे अपने अनुभव बांटने में संकोच करते हैं और शर्मीली प्रवृत्ति के हो जाते हैं। मशहूर मनोविज्ञानी फ्रायड कहते भी थे कि लडकियां अपने पिता से और लड़के माँ से भावनात्मक रूप से अधिक जुड़ाव महसूसते हैं। कॅरियर में सफलता के पायदान चढ चुके पिताओं की बच्चियों के आयडल हमेशा से वही रहे हैं। व्यवहार विज्ञानी भी मानते हैं कि आपके परिवार का वातावरण और अपनत्व की भावना पिता के बर्ताव पर निर्भर करती है। यही बाद में जीवन पर भी प्रभाव डालती है।

 फिल्म स्टार रितिक रोशन यूं तो अपने बेटे को बहुत प्यार करते हैं, पर खुद को कड़क पिता बताते हैं। चौंकिए नहीं, वे सिर्फ खाने के मामले में अपने बेटे से कड़ाई करते हैं। गठीली काया वाले इस स्टार की क्योंकि डाइट के प्रति चौकन्ना रहना आदत हो चुकी है। प्रियंका गांधी के पतिदेव रार्बट वढेरा कितने जिम्मेदार पिता हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जब प्रियंका अपने भाई और माँ के लिए चुनाव प्रचार में रायबरेली या अमेठी दौरे में व्यस्त थीं तो उनके दोनों बच्चे पापा के पास ही रहते थे। हिन्दी फिल्मों का पसन्दीदा विषय माँ रहा है, कई फिल्मों में माँ की केन्द्रीय भूमिका भी हुआ करती थी। जबकि पिता के नाम पर ‘कुंवारा बाप’ या ‘पिता’ सरीखी कुछ इनी-गिनी फिल्में ही रही हैं। ऐसे में शायद ऐसा साहस पहली ही बार हो रहा है, जब अभिषेक बच्चन को उनके ही पिता महानायक अमिताभ बच्चन के पिता की भूमिका में सारी दुनिया देखेगी। निर्देशक बालकृष्णन यानी बाल्की की ‘पा’ अभी निर्माणाधीन है लेकिन इसकी चर्चा का कारण सिर्फ पिता होना ही है। ‘एक रिश्ता’ और ‘वक्त’ जैसी फिल्मों में अमिताभ बच्चन के बेटे की भूमिका निभा चुके अक्षय कुमार मानते हैं कि वे बिग बी में अपने पिता को देखते हैं। 1987 में हालीवुड में कॉमेडी फिल्म आई थी ‘लाइक फादर लाइक सन’, जिसमें बाप बेटे का शरीर बदल जाता है और वे एक-दूसरे की गोपनीय चीजों के बारे में जान लेते हैं। इसको वहां के युवाओं ने बहुत पसन्द किया था, यहां तक कि वे एक-दूसरे को आज भी इसकी सीडी भेंट करते मिल जाएंगे।

विकास और आधुनिकता के इस दौर में जब सब कुछ स्पष्ट और सटीक होता जा रहा है, आज का पिता भी चाहता है कि उसका बच्चा समस्याओं का समाधान करना खुद सीखे, समाज में अपनी सम्मानित हैसियत बनाए। न कि वह उसके (पिता के) नाम से जाना जाए। चोट खाने की बजाए संभल कर चले और हर नये अनुभव के साथ परिपक्व होता जाए। अपने अनुभवों का जखीरा बच्चों के सिर पटक कर वह बोझ नहीं बढमता, बल्कि उसकी सहूलियत का खयाल रखते हुए अपना दायरा समेटता जाता है। यह मत मान लीजिए कि पिता बदल रहा है या पहले के पिता दोयम थे, दरअसल बदल रही है उसकी भूमिका और अपनापन बांटने का तरीका। पिता बहुत महत्वपूर्ण होता जा रहा है, केवल संरक्षक होने की बजाए वह शिक्षक और सहयोगी भी हो रहा है। पहले जैसा थानेदार न होकर, वह दोस्ताना रवैया अपना रहा है। बच्चों की गलती या दुविधा को भांप कर उनका विश्लेषण भी करता है और बराबरी के साथ हर समस्या पर डिस्कशन करने से भी नहीं हिचकता। अपनी गलतियों या असफलताओं को स्वीकार करने में उसको कोई संकोच नहीं होता। यही कारण है कि ‘फादर्स डे’ हमारे लिए भी विशेष होता जा रहा है।

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