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इक्कीसवीं सदी में बीसवीं सदी की नौकरशाही नहीं चलेगी

हांगकांग की एजेंसी : पोलिटिकल एंड इकनॉमिक रिस्क कंसल्टेंसी ने अपनी ताज रपट में भारतीय नौकरशाही को पूरे एशिया में निकृष्टतम बताया है। उनकी ग्रेडिंग के अनुसार सर्वश्रेष्ठ देश को जीरो तथा निकृष्टतम को 10 अंक देने का प्रावधान था और भारतीय अफसरशाही को 9.5 अंक मिले।

गए बरसों में नीति निर्धारण, कार्यान्वयन और जनता के साथ संपर्क इन तीनों मोर्चो पर देश की नौकरशाही हम हिन्दुस्तानियों को भी विफल, भ्रष्ट और गैरजवाबदेह नजर आती रही है। अब तक तनख्वाहों की तुलनात्मक कमी इसकी बड़ी वजह बताई जाती थी, पर अब तो उसे भी छठे वेतन आयोग ने लगभग खत्म कर दिया है। इसके बावजूद अनेक मौकों पर (जैसे मुंबई हमले के दौरान) निर्णयविहीनता, परस्पर दोषारोपण और उपकरण खरीदी में खुले भ्रष्टाचार के शर्मनाक प्रमाण उजागर हुए।

भारत की नौकरशाही का राज और कुछ न भी हो, इस अहसास से तो तर-ब-तर रहता ही है, कि चयन हो जाने के बाद उनको मिला वरिष्ठता के साथ सीढ़ी-दर-सीढ़ी प्रोन्नति की गारंटी देने वाला हुकूमत का यह पट्टा अमर है। इसलिए (सत्यनारायण कथा की) कलावती कन्या के पिता की तरह वे समय-समय पर मन में उठने वाले शुभ संकल्पों को सेवानिवृत्ति तक टालते जाते हैं। गलत राजनैतिक दबावों के आगे आत्मसमर्पण करने की ग्लानि भी उनको नहीं व्यापती है, और न ही ज्ञात नियम और सिविल सर्विस के कोड ऑफ कण्डक्ट की मर्यादाओं का त्याग।

बेहतर नौकरशाही कैसी हो, इस पर अलबत्ता रिटायर होने के बाद (प्राय: अंग्रेजी में) उनकी आलेखों-पुस्तकों की श्रृंखलाए सामने आती रहती हैं। नौकरशाहों के काम की समय-समय पर सूक्ष्म निगरानी करने और कार्यकुशलता को वरिष्ठता के ऊपर तवज्जो देकर प्रमोशन देने की जो चर्चाएं नई सरकार में उठ रही हैं, यह इस पृष्ठभूमि में स्वागतयोग्य हैं। नौकरशाही को भी उन्हें अपने लिए एक वरदान मान कर अपनी दिमागी मासपेशियों को कठोर मेहनत और सतत जवाबदेही के लिए चुस्त-सक्षम बनाने की कवायद शुरू कर देनी चाहिए।

सूचनाधिकार ने एक हद तक जांच कमीशनों की रपटों को संसद और जनता से छिपाने की गुंजइश देने वाली धाराओं को खत्म कर दिया है इसका फायदा इन चुनावों के दौरान मीडिया ने उठाया, नतीजतन कई दागी लोगों को टिकट नहीं मिल पाया, और जिनको मिला उन्हें (तथा जिन्हें नहीं मिला उनके प्रॉक्सी प्रत्याशियों को) जनता ने बड़ी तादाद में हराया। अब देखिए मीडिया को ग्लोबल मासपेशियों से ताकत मिली तो 2009 में कितने गुनाह कबूले जा रहे हैं। ओबामा ने मंजूर किया कि मध्य एशिया में कट्टरपंथी आतंकवाद को दबाने के लिए जो सैन्य कार्रवाई की गई, वह कई जगह गलत थी।

इंग्लैण्ड में ब्राउन स्वीकार कर रहे हैं, कि उनकी काबीना के भ्रष्टाचारी मंत्रियों ने देश की आखों में धूल झोंक कर जनता का पैसा खाया, नेपाल में सरकार ने कुबूल किया कि सेना-प्रमुख की मुअत्तली गलत थी। माकपा नेता मान रहे हैं, कि पार्टी ने संप्रग के साथ सरकार न बना कर जो गलती की थी, उसे समर्थन वापस लेकर और भी घातक बनाया। और भाजपा कह रही है कि समय रहते पार्टी की भितरघात को हल न करना चुनावों में उनकी हार की वजह बना। यदि इसी तरह की आत्मालोचना और नौकरशाहों के काम-काज का लेखा-जोखा भी प्रांत स्तर से लेकर केन्द्र स्तर तक हमें मिलता रहे, तो लोकतंत्र के पहिए निश्चय ही और अधिक तेजी से घूमने लगेंगे।

जब लगातार ऐसा होगा, तो नौकरशाही का आत्मघाती अहंकार घटेगा, सरकार द्वारा नियुक्त समितिया उनसे प्रमोशन से पहले सवाल पूछेंगी तो नीतियों, कार्यक्रमों के कार्यान्वयन के बारे में वे स्वयं भी अपने विभाग और खुद से सवाल पूछेंगे और ऐसे विवेकपूर्ण जवाब ढूंढेंगे जिन्हें वे कमेटियों की बैठकों तथा टी.वी. पत्रकारों के आगे बिना बगलें झांके पेश कर सकें। इस मायने में इन चुनावों ने जो फटाफट लोकतंत्र रचा है, उसके नौकरशाही पर लागू होने के कुछ खतरे भले हों, लेकिन व्यवस्था की मौजूदा ठण्डी, अहंकारी गैरजवाबदेही से तो वे खतरे तब भी कम ही ठहरेंगे।

पहले राहुल गाधी और अब प्रधानमंत्री के मुख से यह सुनकर, कि भारतीय नौकरशाही में हर स्तर पर सुधार और जवाबदेही तय कराने के लिए सिविल सर्विसेज एक्ट-2009 नामक नया कानून बनाए जने की तैयारी हो, तो हम लगभग ब्रह्मानंद का अनुभव कर रहे हैं। प्रस्तावित बिल की मूल मंशाए दो हैं : एक, कि सरकारी अफसरों के कामकाज की नियमित समीक्षा की मार्फत सरकार की नीतियों के कार्यान्वयन की स्थिति के ब्योरे लगातार स्पष्टता से सामने आते रहें। और दो, अफसरों के द्वारा सरकारी काम के निवहन में राजनेता घुस कर कार्यकुशल और ईमानदार अफसरों को दूर-दराज के इलाकों में ‘फिंकवा’ कर अपने प्रिय और भ्रष्टाचार में भरपूर मदद की गारंटी देने वाले अफसरों को नियुक्त न कर पाएं।

शुरू में यह बिल आई.ए.एस. तथा आई.पी.एस. सेवाओं पर लागू होगा, पर आगे इसकी परिधि भी बढ़ेगी और सरकारी खजाने से तनख्वाह-भत्ते पाने वाला हर कर्मी इसके दायरे में आ जाएगा। इस कानून के तहत आगामी बजट सत्र के तुरंत बाद केन्द्रीय चुनाव आयोग सरीखी तीन से पांच सदस्यों की एक नई केन्द्रीय सार्वजनिक सेवा संस्था (सेंट्रल पब्लिक सर्विसेज अथॉरिटी : सी.पी.एस.ए.) का गठन किया जएगा।

यह संस्था सभी सार्वजनिक सेवा अधिकारियों के काम-काज, नियुक्ित तथा तबादलों का लेखा-जोखा संसद को नियमित रूप से देगी। उम्मीद है कि इससे अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित होगी साथ ही राजनेताओं द्वारा अधिकारियों के कामकाज में ट्रांसफर-पोस्टिंग-प्रोन्नति के बहाने सीधे (और प्राय: बेज) हस्तक्षेप पर रोक लगेगी, जो प्रशासनिक सेवाओं की मौजूदा अपारदर्शिता और नेताओं से भ्रष्टाचारी गठजोड़ों की सबसे बड़ी वजह है।

यू सरकार अब तक अपने अफसरों के काम की तिमाही तथा सालाना समीक्षाए तो करती रही है, पर उस आकलन की प्राथमिकताए और विभागाध्यक्षों-मंत्रियों द्वारा दी गई टिप्पणियों की वजहें अस्पष्ट रहे हैं। जिस अफसर से जनता परेशान है, वह कई जगह नेता मेहरबान होने से पहलवान बन बैठता है। अब मंत्रालय के सम्बद्ध मंत्री, विभागीय सचिव और सी.पी.एस.ए. (सभी स्तरों के) अफसरों के कामकाज की जांच के लिए पारदर्शी, समरूप और स्पष्ट मानदंड तैयार कराएंगे। छठे वेतन आयोग ने आर्थिक प्रोत्साहन कार्य-निष्पादन क्षमता से जोड़े जाने की जो पेशकश की थी, वह भी इससे साकार होगी।

चुनाव 2009 के नतीजे तथा सूचनाधिकार जो महाप्रश्न रेखांकित कर रहे हैं, वह यह है, कि भविष्य का भारत एक पारदर्शी लोकतांत्रिक र्ढे पर चलने वाली सार्वजनिक प्रशासकीय मशीनरी चलाएगी, कि देश का राजकाज पुरानी सामंतवादी गैरजवाबदेह हनक वाली वह मशीनरी, जिसे नेता-ठेकेदार और बाबुओं की तिकड़ी हाक रही है।

तिकड़ी ने गरीबों के हकों की यह कह कर बार-बार उपेक्षा की है, कि यह लोकतंत्र अंतरराष्ट्रीय बाजर की ताकतों से संचालित है, इसमें नौकरशाही एक हद से आगे दखल नहीं दे सकती; लेकिन वहीं खुले बाजर में स्पर्धा को बढ़ाने के लिए, यही गुट सामान्य हैसियत वाले हिम्मती उपक्रमी द्वारा पूजी का जुगाड़ करने को उतरने पर उनकी कोशिशों को (प्राय: किसी घाघ उद्योगपति तथा मंत्री जी की कनखी का इशारा पा कर) अड़ंगेबाजियों के जंगल में भटका देता है।

चित भी मेरी-पट भी मेरी, अंटा मंत्री/ ठेकेदार जी (या अमुक जी) का, यह तो न्यायसंगत पूजीवाद भी नहीं स्वीकार करेगा। घट-घट व्यापी मीडिया, सूचना के अधिकार और सी.पी.एस.ए. के वक्त में प्रशासनिक सेवाएं जब तक प्रशासन में समता और न्याय की बहाली कराने का ठोस प्रमाण नहीं देतीं, अपने कवच को अजर-अमर नहीं मान सकतीं

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