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श्रमजीवी मानुष के हित में खड़ी कलम

बांग्ला मासिक ‘भाषा बंधन’ और त्रैमासिक ‘बर्तिका’ में प्रतिवेशी साहित्य को अनूदित कर लाने में हमारी सदैव रुचि रही है। अभी-अभी हमने आठवें दशक के महत्वपूर्ण हिंदी कथाशिल्पी राजेन्द्र राव की कुछ कहानियों का बांग्ला में अनुवाद कराया है। मेरे लिए यह देखना एक अलग अनुभव रहा कि कल-कारखाने की जिंदगी को राजेन्द्र राव ने पृथक कोण से देखा-रचा है। ऐसी कहानियों में राव की कलम श्रमजीवी मानुष के पक्ष में तनकर खड़ी है।

बांग्ला समेत भारतीय व विदेशी भाषाओं में अनेक कवि-कथाकारों ने कल-कारखानों में दिन-रात खटनेवालों पर, विशेषत: श्रमिकों पर महत्वपूर्ण रचनाएं दी हैं किंतु उनसे राजेन्द्र राव की तत्संबंधी कहानियां इस लिहाज से अलग और आगे हैं कि उनमें टेक्नीशियनों की जद्दोजहद और कापरेरेट जगत के विरोधाभास भी अत्यंत प्रखरता से प्रकट हुए हैं।

राजेन्द्र राव पेशे से मेकैनिकल इंजीनियर हैं और पांच साल पहले वे सेवानिवृत्त हो चुके हैं पर उस पद पर रहते हुए भी उनकी संवेदना मजदूरों से जुड़ी और उन्होंने कल-कारखानों के मजदूरों के जीवन-यथार्थ को अपनी कई कहानियों की अंतर्वस्तु बनाया लेकिन उसके पहले ऐतिहासिक यथार्थ के परिप्रेक्ष्य में वे वर्ग चेतना से लैस हुए। यदि लैस नहीं हुए होते तो श्रीमिकों के जीवन, श्रम ओर संघर्ष का मर्मस्पर्शी चित्रण नहीं कर पाते। तमाम अभावों, संघर्षो और प्रतिकूलताओं के बावजूद राजेन्द्र राव की कहानियों के पात्र पराजय नहीं स्वीकार करते। वे लड़ते हैं।

राजेन्द्र राव की पहली कहानी ‘शिफ्ट’ 1971 में ‘कहानी’ पत्रिका में श्रीपत राय के संपादन में छपी थी। राव के कहानी संग्रह ‘नौसिखया’ की कहानियां कल-कारखाने की जिंदगी के अंतरंग अनुभव की कहानियां हैं। इन कहानियों को पए़ते हुए साफ प्रतीत होता है कि राव की कथा-यात्रा निरंतर परिवर्तनशील मजदूर जीवन के यथार्थ की सहयात्रा है। राव मजदूरों-टेक्नीशियनों के साथ चलते रहे और चलते हुए लिखते रहे।

राजेन्द्र राव ने कारखाने की जिंदगी का अतिक्रमण भी किया और अपने समय के दूसरे मर्मस्पर्शी मुद्दों को भी अपनी कहानी की अंतर्वस्तु बनाया। उदाहरण के लिए ‘कीर्तन तथा अन्य कहानियां’, ‘कोयला भई न राख’, असत्य के प्रयोग, ‘सूली ऊपरसेज पिया की’ और ‘दूत के दांत’ कहानी संग्रहों को देखा ज सकता है।विषय वविध्य राजेन्द्र राव के दोनों प्रकाशित उपन्यासों- ‘ना घर तेरा ना घर मेरा’ और ‘खाला का घर नाहि’ में भी है। इन दोनों उपन्यासों और अपनी शताधिक कहानियों में राजेन्द्र राव अपने अनोखे रचना कौशल का भी परिचय देते हैं। इस रचना कौशल के बूते ही वे नए जीवन की संधान की रचनाएं हिंदी जगत को दे पाए हैं।

किसी रचना की गुणवत्ता इस बात में होती है कि वह अपने समय के सवालों से कितना मुठभेड़ करती है और अपने समय के मनुष्य के पक्ष में कितनी शिद्दत से खड़ी होती है। इस कसौटी पर भी राव की रचनाधर्मिता खरा उतरती है। राजेन्द्र राव अपने वक्त की संवेदना का नया संसार रचने को सदा बेचैन दिखते हैं। यह रचनात्मक बेचैनी उनके रेखा चित्रों-रिपोर्ताजों में भी लक्ष्य की ज सकती है।

हावड़ा के डोमजुर के अभिशप्त वेश्या जीवन की आंखों देखी कहानी उन्होंने 1973 में ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ में धारावाकि लिखी थी। उसका शीर्षक था- ‘हाटे बाजरे।’ यह सीरिज उस व्यवस्था को बेनकाब करती है जो इंसान को रेड लाइट एरिया में नारकीय यातना ङोलने को विवश करती है। सिर्फ कथाकृतियों के मार्फत ही नहीं, रेखाचित्रों-रिपोर्ताजों-स्तंभों के जरिए भी अपनी सृजनशीलता को कैसे बचाए और बनाए रखा ज सकता है, इसकी एक नजीर राजेन्द्र राव हैं। उनकी सोच में इतनी पारदर्शिता है कि वे निरंतर बेलौस होते गए हैं, उनके विकास के नैरंतर्य में भी इसे लक्ष्य किया ज सकता है।

मुङो यह देखकर अच्छा लगता है कि राजेन्द्र राव लिखने-पढ़ने में डूबे रहते हैं। नए से नए लेखकों के साहित्य की अद्यतन जनकारी रखते हैं। धर्म, भूगोल, विज्ञान, खेल और साहित्य में समान रुचि रखते हैं। विद्यार्थी काल में ही किस्सा तोता मैना, चंद्रकांत संतति, पढ़ीं तो उसी के समानांतर स्टालिन, लेनिन और माक्र्स की जीवनियां भी पए़ीं और उनहें पढ़ने के बाद राजेन्द्र राव पक्के साम्यवादी हो गए थे। लेकिन इस साम्यवादी युवक ने जब लोहिया को देखा और सुना तो उसके दीवाने होते भी देर न लगी। लोहिया के प्रभाव में कई लेखक आए। कई भाषाओं के।

एक बड़ा रचनाकार वह होता है जो बड़े महापुरुषों के अच्छे विचारों को रख लेता है। वे विचार कई रूपों में, कई बार सायास, कई बार अनायास उसकी रचनाओं में प्रस्फुटित हो जते हैं। स्टालिन, लेनिन, माक्र्स से लेकर लोहिया तक की यात्रा करते हुए उनसे कितना कुछ राजेन्द्र राव ने ग्रहण किया और उसका कितना समर्थ उपयोग अपने साहित्य में किया, इस पर समकालीन साहित्य के किसी शोधार्थी को शोध करना चाहिए। मेरी राय में विचार एक ऐसा अवयव है जो राजेन्द्र राव के साहित्य को नया ताप देता है, उसे मूल्यवान बनाता है।

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