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सूचना का अधिकार और अखबार

कोलकाता के जे. एन. मुखर्जी ने एक समाचार पत्र में एक लेख पढ़कर लेखक की पृष्ठभूमि के बारे में जानने के लिए पत्र लिखा। उन्हें महीनों तक जवाब नहीं मिला। लेखक के बारे में जानना जरूरी था, क्योंकि स्वास्थ्य संबंधी एक विषय पर उन्होंने जो दावे किए थे वे भ्रामक थे और एक हद तक बेबुनियाद भी थे।

जे एन मुखर्जी समाचार पत्र के दफ्तर पहुंच गए। लेकिन उन्हें कई बार की भागदौड़ के बाद भी उस लेखक का न तो पता ठिकाना मिला और उसके बारे में कोई जानकारी। लेकिन उस दफ्तर के आखिरी चक्कर में एक संपादकीय सहयोगी ने उन्हें एक जानकारी दी कि कई चीजें प्रायोजित होती है और उसमें लेखक का पता ठिकाना और पृष्ठभूमि तलाशना व्यर्थ है।

जन संचार माध्यमों में रोजाना जितनी तरह की सामग्री परोसी जाती है उनमें से बहुत बड़ा हिस्सा खबरों का नहीं होता है। उन्हें मौटेतौर पर प्रचार सामग्री कहा जा सकता है। लेकिन वो खबरों की तरह प्रस्तुत की जाती है और उन पर खबरों की तरह भरोसा भी किया जाता है। अपनी बातें लोगों तक पहुंचाने के लिए तमाम तरह के संगठन रिपोर्टरों को तरह तरह से प्रेरित करते हैं। ये एक खुली किताब की तरह है कि पत्रकारों को बड़े बड़े गिफ्ट मिलते हैं। सैर सपाटे करने की सुविधाएं मिलती है।

इन सबके प्रभाव में रिपोर्टर खबरें प्रस्तुत करते हैं। कहा जा सकता है कि दूसरे पेशों की तरह पत्रकारिता में भी बहुत लोग ऐसे हो सकते हैं। उस संस्थान को उनके व्यक्तिगत आचरण के बारे में कैसे हर बात की जानकारी हो सकती है जिसमें वह काम करता है। लेकिन संस्थान को एक बात की जरूर जानकारी होती है यदि कोई संस्था या व्यक्ति अपनी उपलब्धियों या अपने शोध की सफलता के लिए किसी रिपोर्टर को कहीं ले जाता है लेकिन उसकी रिपोर्ट को रिपोर्टर की खबर के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। क्या किसी को यह लगे कि उस खबर को प्राप्त करने के लिए किसके संसाधन का इस्तेमाल किया गया तो ये बताया जाना चाहिए?

सीधा सवाल यह कि क्या मीडिया संस्थान को सूचना के अधिकार कानून के तहत लाया जा सकता है? यह कानून निजी संस्थानों पर सीधे तौर पर लागू नहीं है। मीडिया खुद को संसदीय लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में परिभाषित करता है। जिस तरह से संसदीय लोकतंत्र के तीनों स्तंभों पर यह कानून लागू होता है तो मीडिया संस्थानों पर क्यों लागू नहीं किया जाना चाहिए?

तीनों स्तंभों पर भी इस कानून के लागू होने की एक सीमा निश्चित की गई है। पर मीडिया का मामला कई मायने में बेहद संवेदनशील है। जैसे मीडिया के पास अपने सूत्रों को नहीं बताने का विशेषाधिकार है। भले ही उसके दुरुपयोग की भी शिकायतें मिलती रहती है। लेकिन जिस तरह से संसद और न्यायालयों ने कुछ विशेषाधिकार अपने लिए सुरक्षित बनाए रखें हैं मीडिया को भी ऐसे कुछ विशेषाधिकार हासिल हो सकते हैं। लेकिन जहां विशेषाधिकार पर आंच नहीं आती हो कम से कम वैसे मामलों में तो सूचना के अधिकार के तहत उन्हें लाया जा सकता है।

ऐसा नहीं है कि सूचना का अधिकार कानून मीडिया पर लागू नहीं है। सार्वजनिक उपक्रमों के तहत संचालित मीडिया पर ये कानून लागू हैं। पिछले विधानसभा के चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश में कई जिलों में मतदाताओं ने चुनाव आयोग के जरिये मीडिया संस्थानों से कई जानकारियां हासिल की थी। खासतौर से उम्मीदवारों द्वारा विज्ञापन के मद में किए गए खर्च का ब्यौरा हासिल किया था। एक मौके पर सूचना के अधिकार कानून के तहत पीआईबी से उनके यहां मान्यता प्राप्त तमाम स्वतंत्र पत्रकारों की आमदनी का हिसाब किताब पूछा गया।

पीआईबी में मान्यता प्राप्त स्वतंत्र संवाददाताओं को अपनी मान्यता के नवीनीकरण के लिए अंकेक्षण द्वारा सत्यापित आमदनी का ब्यौरा पेश करना होता है। पीआईबी ने आमदनी के बारे में सूचना की मांग करते हुए इस सवाल पर टिप्पणी भी दर्ज करने की मांग की थी कि क्या इस तरह की सूचनाएं देनी चाहिए? जब हर वर्ष अपनी आमदनी का ब्यौरा पेश करने की बाध्यता है तो फिर सूचना के अधिकार कानून के तहत किसी को यह जानकारी लेने से कैसे रोका जा सकता है? मीडिया का पूरा व्यापार भरोसे पर टिका है।

जिस तरह से मीडिया के आचरण को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं वैसी स्थिति में एक रास्ता ये है कि पारदर्शिता के दरवाजे थोड़े खोले जाए। ये किया जा सकता है कि सूचना के अधिकार कानून की भवानाओं के अनुरूप खुद मीडिया कोई ऐसा तंत्र विकसित करें जहां से पाठक अपनी सूचनाओं का जवाब हासिल कर सकें । अभी मीडिया द्वारा खुद खबरों के लिए इस कानून का इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन मीडिया को भी अपने लिए इस कानून का इस्तेमाल करने की सुविधा मुहैया कराई चाहिए।

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