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बारगेन की स्थिति में हैं बिहारी मजदूर

बिहार से मजदूरों के पलायन की गति मंद पड़ गई है। अब दो जून की रोटी के लिए उन्हें बाहर नहीं जाना पड़ता। पंजाब, हरियाणा के खेत और मुंबई, दिल्ली, सूरत तथा बंगलुरू के कारखाने इस बात गवाही दे रहे हैं। मजदूरों को ढोने वाली ट्रेनें यही तस्वीर दिखाती हैं। बिहारी श्रमिक अब बारगेन करने की स्थिति में हैं। दो से चार गुना मजदूरी देने के बावजूद बिहारी मजदूर नहीं मिल रहे हैं।


पंजाब के स्टेशनों पर तो बिहार की ट्रेनों के पहुंचने से पहले ही वहां मजदूरों के दलालों की भीड़ जुट जाती है। दलाल अधिक से अधिक मजदूरों को अपने कब्जे में करने के लिए उन्हें एडवांस के साथ ही अधिक मजदूरी देने का वादा भी कर रहे हैं। सूरत की सूत फैक्ट्रियों के पास दस दिनों तक हजारों ट्रक खड़े रहते हैं और उसे अनलोड करने के लिए मजदूर नहीं मिलते। नरेगा के तहत घर में मिल रहे काम के अलावा बड़े पैमाने पर चल रही विकास योजनाओं के कारण मजदूरों को अब बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ती।


बिहार से कितने मजदूर बाहर जाते हैं इसका सही आंकड़ा बिहार सरकार के पास नहीं है। श्रम संसाधन विभाग के प्रधान सचिव व्यास जी कहते हैं कि बाहर जाने वाले मजदूरों की पहचान कराई जा रही है। जल्द ही उन्हें पहचान पत्र दिया जाएगा। लेकिन एक दिक्कत भी हो रही है। जनप्रतिनिधियों को पावर की गर्मी में मदहोश होकर संपत्ति हड़पने का ऐसा चस्का लगा है कि वे अब मजदूरों की पहचान भी पचाने लगे हैं। जो जॉब कार्ड मजदूरों के पास होने चाहिए थे वह मुखिया जी दबाए बैठे हैं।


एक उदाहरण। ग्रामीण विकास विभाग ने पूर्णिया से जुड़े़ कई मामलों की जांच भी कराई है। जांच में कई स्तरों पर गड़बड़ी का पता चला है। जिले के चार मुखियों, दो कार्यक्रम पदाधिकारियों और नरेगा से जुड़े कुछ इंजीनियरों पर अब एफआईआर की तैयारी चल रही है।

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