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ग्रामीण इलाकों में लोगों की जिंदगी भी बदली

उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजे और कांग्रेस के शानदार प्रदर्शन ने साफ कर दिया है कि नरेगा ने ग्रामीण वोटरों को कांग्रेस के पक्ष में झुकाने में बड़ी भूमिका निभाई। एक मोटे आँकड़े से ही यह साफ है-कांग्रेस ने यूपी के उन 39 जिलों में अच्छा प्रदर्शन किया जहाँ नरेगा शुरुआती दो चरणों में लागू हुई थी। यूपी में नरेगा का पहला चरण 2 फरवरी 2006 और दूसरा 15 मई 2007 को लागू हुआ।


नरेगा ने कांग्रेस को चुनावी सफलता ही नहीं दिलाई बल्कि ग्रामीण इलाकों में लोगों की जिंदगी भी बदली। मसलन राजधानी लखनऊ से लगा जिला बाराबंकी। यहां से मजदूरी के लिए गांव वाले लखनऊ का रुख करते थे। नरेगा ने यह तस्वीर बदल दी।  खेतिहर मजदूरों व अन्य श्रमिकों को गांव में ही रोजगार मिल गया। बकौल जॉब कार्डधारक बजरंग रावत-पहले खेती के काम से फुर्सत होने पर बाराबंकी या लखनऊ में  ईंट-गारा की मजदूरी करने चला जाता था या फिर रिक्शा चलाता था। लेकिन जब से नरेगा लागू हुई, गांव में ही मतलब भर का काम मिल जाता है। लखनऊ से ही लगा एक और जिला है रायबरेली। यह कांग्रेस व यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गांधी का संसदीय क्षेत्र भी है। नरेगा की शुरुआत भी रायबरेली जिले से हुई थी। इस जिले में राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र अमेठी का हिस्सा भी लगता है। योजना लागू होने के बाद यहां के गांवों में मजदूरी दो गुनी तक बढ़ गई है।
लखीमपुर जिले की खीरी और धौरहरा दोनों सीटें कांग्रेस की झोली में चली गईं। इसका बड़ा श्रेय नरेगा जैसी योजना को देना गलत न होगा। इस योजना से मजदूरों के जीवन स्तर में सुधार आया। निघासन क्षेत्र के झण्डी गांव के किसान रामभरोसे और रामचरन का कहना है कि पहले मजदूरी के लिए इधर-उधर भटकना पड़ता था लेकिन अब कम से कम उन्हें साल में सौ दिन तो रोजगार मिल ही जाता है।
सीरीज का संयोजन अतुल कुमार

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