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पंजाब में मजदूरों की मारामारी

पंजाब चाहे तो नरेगा लागू करने के मामले में बिहार और यूपी से सीख ले सकता है। पंजाब में इन दिनों इन दोनों राज्यों से आने वाले मजदूरों के लिए लगभग मारामारी है। पिछले साल भी ऐसा ही हाल था, पर इस बार किसानों को ज्यादा परेशानी हो रही है। धान की रोपाई का काम 10 जून से ही शुरू हो गया है लेकिन मजदूरों की कमी की वजह से रफ्तार धीमी है और अभी अधिकतर खेतों को रोपाई के लिए तैयार ही किया जा रहा है।


नरेगा की सफलता के कारण बिहार और यूपी से पंजाब और हरियाणा आने वाले मजदूरों की संख्या कम हुई है। दूसरी ओर, पंजाब में नरेगा के तहत उपलब्ध फंड से कहीं कम अब तक खर्च हुआ है। हालत यह है कि पंजाब का हिस्सा तो दूर की बात, प्रदेश के सभी 20 जिलों में केंद्र से प्राप्त राशि भी पूरी तरह से खर्च नहीं हो पाई। कई जिलों में तो हाल यह रहा कि वर्ष 2008-09 के दौरान एक करोड़ रुपये भी खर्च नहीं हो पाए। इस बात को लेकर कांग्रेसी विधायक पंजाब विधानसभा में सवाल भी उठा चुके हैं।  ग्रामीण विकास एवं पंचायत विभाग से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, पंजाब में वर्ष 2007-08 के दौरान होशियारपुर, अमृतसर, जलंधर तथा नवांशहर जिलों में ही यह योजना लागू हो पाई थी। वर्ष 2008-09 के दौरान सभी 20 जिले इसके तहत आ गए। लेकिन इस दौरान इन जिलों में उपलब्ध राशि में प्रदेश का हिस्सा बहुत ही कम था। दस जिलों के नरेगा फंड में तो प्रदेश सरकार ने कोई हिस्सा डाला ही नहीं। इनमें फरीदकोट, फतेहगढ़ साहिब, फिरोजपुर, जलंधर, कपूरथला, लुधियाना, मोगा, मोहाली तथा संगरूर जिले शामिल हैं। इस अवधि के दौरान फरीदकोट, फिरोजपुर, कपूरथला, लुधियाना, मोगा, मोहाली, मुक्तसर, पटियाला और तरनतारन ऐसे जिले रहे जहां खर्च सौ करोड़ से भी कम रहा।

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