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नरेगा को नहीं मिल पा रहे हैं मजदूर

महाराष्ट्र में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना बहुत ज्यादा सफल नहीं है। राज्य के रोजगार गारंटी योजना मंत्री मदन पाटील ईमानदारी से इस सच को कबूल करते हैं। उनका कहना है कि इस योजना को शत-प्रतिशत सफलता तभी मिल सकती है जब मजदूर मिलेंगे। सरकार रोजगार देने के लिए आगे है तो मजदूर ही नहीं मिल रहे हैं।


गरीब मजदूर भी इस योजना में दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं। इसका कारण है कि मजदूरों को सरकारी मेहनताना से ज्यादा मेहनताना दूसरी जगह मिल रहा है। सरकार इस योजना के तहत मजदूरों को प्रतिदिन 68 से 78 रुपये देती है जबकि उन्हें प्राइवेट काम में 100 रुपये से ज्यादा मिल जाते हैं। पाटील का कहना है कि वह अधिकारियों के साथ अगले महीने बैठक करके समीक्षा करेंगे और मजदूरों को ज्यादा मेहनताना देने के लिए केद्र सरकार से अनुरोध किया जएगा। मजदूरों के बीच जगरूकता अभियान भी चलाने की  योजना तैयार की जा रही है। कोंकण में बड़े पैमाने पर पेड़ लगाने का काम शुरू किया जाएगा।


राज्य में पहले 12 जिलों में इस योजना को लागू किया गया था। अब 33 जिलों में इसे लागू कर दिया गया है। इन जिलों में नक्सल प्रभावित जिले भी शामिल हैं। विपक्ष का आरोप है कि इस योजना को सफल बनाने के लिए राज्य सरकार दिलचस्पी कम ले रही है जिससे मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी कम मिलती है। नांदेड़, परभणि और कोंकण से मजदूर पलायन करते हैं। फोटो नहीं होने के कारण हजरों मजदूरों को जॉब कार्ड नहीं दिए गए है। राज्य में इस योजना का तीसरा चरण लागू है। वित्तीय वर्ष 2008-09 में 633 करोड़ 61 लाख रुपये खजने में आए लेकिन खर्च हुए 356 करोड़ 65 लाख रुपये। 25021 काम के लिए 9 लाख 6 हजार 297 परिवार को रोजगार दिया गया। इसमें 69.31 लाख अनुसूचित जाति, 185.44 लाख अनुसूचित जनजाति, 194.06 लाख महिलाएं और 165.11 लाख अन्य को रोजगार मिला। 10748 काम पूरा किया गया और 14273 काम अभी प्रगति पर है।

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