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चंद्रलेखा से काइट्स तक, डांस ही डांस

चंद्रलेखा से काइट्स तक, डांस ही डांस

काइट्स के हीरो बॉलीवुड के टैलेंटेड रितिक रोशन हैं। उनके साथ मैक्सिकन मॉडल एवं अभिनेत्री बारबरा मोरी और हिन्दी फिल्मों की बिंदास अभिनेत्री कंगना रानाउत भी हैं। ‘काइट्स’ में तिक रोशन का सालसा डांस रंग जमा सकता है, क्योंकि तिक रोशन एक कुशल डांसर हैं। ‘लेट्स डांस’ की नायिका गायत्री पटेल अमेरिका से लौटीं गुजराती बाला हैं। उन्हें कथक और योग में दक्षता प्राप्त है। वह बेहद कठिन और कमोबेश हैरतअंगेज डांस स्टेप्स कर पाने में सक्षम हैं। इन दोनों फिल्मों से एक बात तो साफ है कि ‘काइट्स’ फिल्म स्टार और डांसर तिक रोशन पर निर्भर है, जबकि कथक नृत्यांगना गायत्री पटेल फिल्म ‘लेट्स डांस’ पर निर्भर हैं। वैसे तो हिन्दी फिल्मों का इतिहास गवाह है कि डांस पर आधारित फिल्मों को कभी सफलता तो कभी असफलता मिलती रही है, पर क्लासिकल डांसरों को कभी सफलता नहीं मिली।
डांस पर आधारित फिल्मों पर नजर डालें तो एस.एस. वासन की फिल्म ‘चन्द्रलेखा’ ऐसी फिल्म साबित होती है, जिसने भारतीय नृत्यशैली को हिन्दी फिल्मों में लोकप्रिय बनाया और नृत्यांगना अभिनेत्रियों के लिए हिन्दी फिल्मों के दरवाजे खोले। इस फिल्म के बाद वैजयंती माला ‘नागिन’ और ‘आम्रपाली’, वहीदा रहमान ‘गाइड’, हेमा मालिनी ‘अभिनेत्री’, जया प्रदा ‘सुर संगम’ जैसी नृत्य प्रधान फिल्मों में अपनी नृत्य कला का कौशल दिखा सकीं। ‘दिल तो पागल है’, ‘डांस डांस’, ‘डिस्को डांसर’ और ‘ताल’ आदि ऐसी फिल्में थीं, जिनमें हिन्दी फिल्मों के शाहरुख खान, मिथुन चक्रवर्ती, ऐश्वर्या राय, स्मिता पाटिल आदि सितारों ने अपनी नृत्य क्षमता का परिचय दिया। माधुरी दीक्षित, गोविन्दा, तिक रोशन आदि ऐसे फिल्म स्टार हैं, जो अच्छा डांस कर लेते हैं और इसी खासियत के कारण दर्शक उन्हें पसंद भी करते हैं। 
जहां तक हिन्दी फिल्मों में शास्त्रीय नर्तकों के अपने कथक, भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी आदि भारतीय नृत्य कलाओं के प्रदर्शन का प्रश्न है, यह सिलसिला 1948 में महान नर्तक उदय शंकर और उनकी पत्नी अमला शंकर के ‘कल्पना’ फिल्म में अभिनय करने के साथ ही शुरू हो गया था। इस नर्तक जोड़ी के बैले डांस के सहारे ही फिल्म की कहानी की पर्ते खुलती चली जाती हैं। इसके बाद 1955 में मशहूर फिल्मकार वी. शांताराम ने कथक सम्राट गोपीकृष्ण को फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ में अपनी पत्नी संध्या का नायक बना कर कथक पर केन्द्रित एक बढिम्या और सफल फिल्म बनाई। बावजूद इसके कि उदय शंकर और अमला शंकर की जोडम्ी ने ‘कल्पना’ और गोपी कृष्ण ने ‘झनक झनक पायल बाजे’ जैसी सफल फिल्में दी थीं तथा एस.एस. वासन की 1960 में प्रदर्शित फिल्म ‘चन्द्रलेखा’ ने भारतीय नृत्यों के झंडे गाडम् दिये थे, हिन्दी फिल्मों में भारतीय शास्त्रीय नृत्य के सितारों को चमकने नहीं दिया। अलबत्ता ‘चन्द्रलेखा’ फिल्म ने दक्षिण की नृत्य कला में पारंगत अभिनेत्रियों के लिए हिन्दी फिल्मों के दरवाजे अवश्य खोल दिये ।
अभी लोकसभा चुनाव के दौरान मल्लिका साराभाई बीजेपी के नेता एल.के. आडवाणी को गांधीनगर में असफल चुनौती दे रही थीं। मल्लिका साराभाई कथक और कुचिपुड़ी नृत्यों में पारंगत हैं। कम लोग जानते होंगे कि मल्लिका साराभाई ने सत्तर और अस्सी के दशक में ‘सोनल’, ‘मुट्ठी भर चावल’, ‘कलंकिनी’, ‘हिमालय से ऊंचा’, ‘शीशा’, ‘अम्मा’ और ‘कथा’ जैसी फिल्मों में अभिनय किया था । इन फिल्मों में से किसी को भी नृत्यांगना मल्लिका साराभाई हिट नहीं बना पायी थीं। इस लिहाज से सुधा चन्द्रन भाग्यशाली हैं कि उनके कटे पैर की कहानी का जबर्दस्त प्रचार हो जाने के कारण उनकी आत्मकथा पर बनी ‘नाचे मयूरी’ सफल हो गयी थी। लेकिन, इस सफलता के बावजूद सुधा चन्द्रन के पांव हिन्दी फिल्मों में जम नहीं सके। आजकल उन्हें टीवी सीरियलों में गाढम्े मेकअप से घर तोडम्ते देखा जा सकता है। ईशा श्रावणी को तो सुभाष घई जैसे निर्माता निर्देशक ने अपनी फिल्म ‘किसना’ की नायिका बनाया था। ईशा मलखम्भ, कथक, बैले, योग, कलारीपयट्टु और छाऊ  में पारंगत हैं। घई ने उनकी इस प्रतिभा का अपनी फिल्म में भरपूर उपयोग किया, लेकिन शानदार नृत्य प्रतिभा प्रदर्शन के बावजूद ईशा हिन्दी फिल्मों के दर्शकों को प्रभावित नहीं कर सकीं। उन्हें अभी जोया अख्तर की फिल्म ‘लक बाई चांस’ में छोटी सी भूमिका में देखा गया। 
‘काइट्स’ और ‘लेट्स डांस’ भारत के शास्त्रीय नृत्यों पर केन्द्रित फिल्में नहीं हैं। इसके बावजूद यह नहीं कहा जा सकता कि इन फिल्मों की सफलता सुनिश्चित है। क्योंकि इधर नृत्य पर केन्द्रित फिल्मों को सफलता नहीं मिल रही। महेश दत्तानी के नाटक पर आधारित फिल्म ‘डांस लाइक ए मैन’ में आरिफ जकारिया और शोभना ने ढलान पर तेजी से लुढम्कते जा रहे भरतनाट्यम डांसर जोडम्ी की भूमिका में जबर्दस्त अभिनय किया था। मगर, बहुत कम दर्शकों ने इस फिल्म को देखा होगा। रामगोपाल वर्मा की फैक्ट्री से निकली अभिषेक बच्चन और अंतरा माली की फिल्म ‘नाच’ से दर्शक कोसों दूर रहे। ‘किसना’ की असफलता सुभाष घई और बडम्े बजट की फिल्म की असफलता से कही अधिक भारतीय नृत्य शैली की असफलता थी। पिछले साल यश चोपड़ा और आदित्य चोपडम ने माधुरी दीक्षित की ‘आजा नच ले’ फिल्म से वापसी करवाने की कोशिश की थी। मगर भारतीय नृत्य की ताकत जताने वाली ‘आजा नच ले’ बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह से हांफ गयी।
इसी प्रकार से सालसा पर आधारित ओन्जोली नायर और डिनो मोरिया की फिल्म ‘हॉलीडे’ भी बुरी तरह से असफल रही थी। उल्लेखनीय है कि ओन्जोली मशहूर सालसा डांसर हैं।

गायत्री पटेल को डांसिंग टॉर्नेडो कहा जा रहा है। रितिक रोशन पहले ही डांसिंग सेंसेशन कहलाते हैं। दर्शक ‘लेट्स डांस’ के टॉर्नेडो और ‘काइट्स’ के सेंसेशन को देखना चाहेंगे। सब कुछ इस पर निर्भर करेगा कि कितने दर्शक इन्हें कितना देखते हैं, लेकिन जहां तक डांस के प्रति दर्शकों के रुझान का अनुमान लगाने का सवाल है, इसका अनुमान कोई लगाये तो इसी से लगा ले कि दक्षिण के मशहूर कोरियोग्राफर प्रभु देवा बतौर निर्देशक जिस फिल्म ‘वांटेड डेड और अलाइव’ का निर्देशन कर रहे हैं, वह नृत्य प्रधान नहीं, बल्कि एक सस्पेंस थ्रिलर फिल्म है, जिसके नायक को एक ग्रुप मार देना चाहता है और दूसरा ग्रुप जिन्दा रखना चाहता है।  ननकाइट्स के हीरो बॉलीवुड के टैलेंटेड रितिक रोशन हैं। उनके साथ मैक्सिकन मॉडल एवं अभिनेत्री बारबरा मोरी और हिन्दी फिल्मों की बिंदास अभिनेत्री कंगना रानाउत भी हैं। ‘काइट्स’ में तिक रोशन का सालसा डांस रंग जमा सकता है, क्योंकि तिक रोशन एक कुशल डांसर हैं। ‘लेट्स डांस’ की नायिका गायत्री पटेल अमेरिका से लौटीं गुजराती बाला हैं। उन्हें कथक और योग में दक्षता प्राप्त है। वह बेहद कठिन और कमोबेश हैरतअंगेज डांस स्टेप्स कर पाने में सक्षम हैं। इन दोनों फिल्मों से एक बात तो साफ है कि ‘काइट्स’ फिल्म स्टार और डांसर तिक रोशन पर निर्भर है, जबकि कथक नृत्यांगना गायत्री पटेल फिल्म ‘लेट्स डांस’ पर निर्भर हैं। वैसे तो हिन्दी फिल्मों का इतिहास गवाह है कि डांस पर आधारित फिल्मों को कभी सफलता तो कभी असफलता मिलती रही है, पर क्लासिकल डांसरों को कभी सफलता नहीं मिली।
डांस पर आधारित फिल्मों पर नजर डालें तो एस.एस. वासन की फिल्म ‘चन्द्रलेखा’ ऐसी फिल्म साबित होती है, जिसने भारतीय नृत्यशैली को हिन्दी फिल्मों में लोकप्रिय बनाया और नृत्यांगना अभिनेत्रियों के लिए हिन्दी फिल्मों के दरवाजे खोले। इस फिल्म के बाद वैजयंती माला ‘नागिन’ और ‘आम्रपाली’, वहीदा रहमान ‘गाइड’, हेमा मालिनी ‘अभिनेत्री’, जया प्रदा ‘सुर संगम’ जैसी नृत्य प्रधान फिल्मों में अपनी नृत्य कला का कौशल दिखा सकीं। ‘दिल तो पागल है’, ‘डांस डांस’, ‘डिस्को डांसर’ और ‘ताल’ आदि ऐसी फिल्में थीं, जिनमें हिन्दी फिल्मों के शाहरुख खान, मिथुन चक्रवर्ती, ऐश्वर्या राय, स्मिता पाटिल आदि सितारों ने अपनी नृत्य क्षमता का परिचय दिया। माधुरी दीक्षित, गोविन्दा, तिक रोशन आदि ऐसे फिल्म स्टार हैं, जो अच्छा डांस कर लेते हैं और इसी खासियत के कारण दर्शक उन्हें पसंद भी करते हैं। 
जहां तक हिन्दी फिल्मों में शास्त्रीय नर्तकों के अपने कथक, भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी आदि भारतीय नृत्य कलाओं के प्रदर्शन का प्रश्न है, यह सिलसिला 1948 में महान नर्तक उदय शंकर और उनकी पत्नी अमला शंकर के ‘कल्पना’ फिल्म में अभिनय करने के साथ ही शुरू हो गया था। इस नर्तक जोड़ी के बैले डांस के सहारे ही फिल्म की कहानी की पर्ते खुलती चली जाती हैं। इसके बाद 1955 में मशहूर फिल्मकार वी. शांताराम ने कथक सम्राट गोपीकृष्ण को फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ में अपनी पत्नी संध्या का नायक बना कर कथक पर केन्द्रित एक बढिम्या और सफल फिल्म बनाई। बावजूद इसके कि उदय शंकर और अमला शंकर की जोडम्ी ने ‘कल्पना’ और गोपी कृष्ण ने ‘झनक झनक पायल बाजे’ जैसी सफल फिल्में दी थीं तथा एस.एस. वासन की 1960 में प्रदर्शित फिल्म ‘चन्द्रलेखा’ ने भारतीय नृत्यों के झंडे गाडम् दिये थे, हिन्दी फिल्मों में भारतीय शास्त्रीय नृत्य के सितारों को चमकने नहीं दिया। अलबत्ता ‘चन्द्रलेखा’ फिल्म ने दक्षिण की नृत्य कला में पारंगत अभिनेत्रियों के लिए हिन्दी फिल्मों के दरवाजे अवश्य खोल दिये ।
अभी लोकसभा चुनाव के दौरान मल्लिका साराभाई बीजेपी के नेता एल.के. आडवाणी को गांधीनगर में असफल चुनौती दे रही थीं। मल्लिका साराभाई कथक और कुचिपुड़ी नृत्यों में पारंगत हैं। कम लोग जानते होंगे कि मल्लिका साराभाई ने सत्तर और अस्सी के दशक में ‘सोनल’, ‘मुट्ठी भर चावल’, ‘कलंकिनी’, ‘हिमालय से ऊंचा’, ‘शीशा’, ‘अम्मा’ और ‘कथा’ जैसी फिल्मों में अभिनय किया था । इन फिल्मों में से किसी को भी नृत्यांगना मल्लिका साराभाई हिट नहीं बना पायी थीं। इस लिहाज से सुधा चन्द्रन भाग्यशाली हैं कि उनके कटे पैर की कहानी का जबर्दस्त प्रचार हो जाने के कारण उनकी आत्मकथा पर बनी ‘नाचे मयूरी’ सफल हो गयी थी। लेकिन, इस सफलता के बावजूद सुधा चन्द्रन के पांव हिन्दी फिल्मों में जम नहीं सके। आजकल उन्हें टीवी सीरियलों में गाढम्े मेकअप से घर तोडम्ते देखा जा सकता है। ईशा श्रावणी को तो सुभाष घई जैसे निर्माता निर्देशक ने अपनी फिल्म ‘किसना’ की नायिका बनाया था। ईशा मलखम्भ, कथक, बैले, योग, कलारीपयट्टु और छाऊ  में पारंगत हैं। घई ने उनकी इस प्रतिभा का अपनी फिल्म में भरपूर उपयोग किया, लेकिन शानदार नृत्य प्रतिभा प्रदर्शन के बावजूद ईशा हिन्दी फिल्मों के दर्शकों को प्रभावित नहीं कर सकीं। उन्हें अभी जोया अख्तर की फिल्म ‘लक बाई चांस’ में छोटी सी भूमिका में देखा गया। 
‘काइट्स’ और ‘लेट्स डांस’ भारत के शास्त्रीय नृत्यों पर केन्द्रित फिल्में नहीं हैं। इसके बावजूद यह नहीं कहा जा सकता कि इन फिल्मों की सफलता सुनिश्चित है। क्योंकि इधर नृत्य पर केन्द्रित फिल्मों को सफलता नहीं मिल रही। महेश दत्तानी के नाटक पर आधारित फिल्म ‘डांस लाइक ए मैन’ में आरिफ जकारिया और शोभना ने ढलान पर तेजी से लुढम्कते जा रहे भरतनाट्यम डांसर जोडम्ी की भूमिका में जबर्दस्त अभिनय किया था। मगर, बहुत कम दर्शकों ने इस फिल्म को देखा होगा। रामगोपाल वर्मा की फैक्ट्री से निकली अभिषेक बच्चन और अंतरा माली की फिल्म ‘नाच’ से दर्शक कोसों दूर रहे। ‘किसना’ की असफलता सुभाष घई और बडम्े बजट की फिल्म की असफलता से कही अधिक भारतीय नृत्य शैली की असफलता थी। पिछले साल यश चोपड़ा और आदित्य चोपडम ने माधुरी दीक्षित की ‘आजा नच ले’ फिल्म से वापसी करवाने की कोशिश की थी। मगर भारतीय नृत्य की ताकत जताने वाली ‘आजा नच ले’ बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह से हांफ गयी।
इसी प्रकार से सालसा पर आधारित ओन्जोली नायर और डिनो मोरिया की फिल्म ‘हॉलीडे’ भी बुरी तरह से असफल रही थी। उल्लेखनीय है कि ओन्जोली मशहूर सालसा डांसर हैं।

गायत्री पटेल को डांसिंग टॉर्नेडो कहा जा रहा है। रितिक रोशन पहले ही डांसिंग सेंसेशन कहलाते हैं। दर्शक ‘लेट्स डांस’ के टॉर्नेडो और ‘काइट्स’ के सेंसेशन को देखना चाहेंगे। सब कुछ इस पर निर्भर करेगा कि कितने दर्शक इन्हें कितना देखते हैं, लेकिन जहां तक डांस के प्रति दर्शकों के रुझान का अनुमान लगाने का सवाल है, इसका अनुमान कोई लगाये तो इसी से लगा ले कि दक्षिण के मशहूर कोरियोग्राफर प्रभु देवा बतौर निर्देशक जिस फिल्म ‘वांटेड डेड और अलाइव’ का निर्देशन कर रहे हैं, वह नृत्य प्रधान नहीं, बल्कि एक सस्पेंस थ्रिलर फिल्म है, जिसके नायक को एक ग्रुप मार देना चाहता है और दूसरा ग्रुप जिन्दा रखना चाहता है। 

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