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भटकते सीरियल बोर होते दर्शक

भटकते सीरियल बोर होते दर्शक

छोटे पर्दे पर सीरियल शुरू होने के बाद खत्म होने का नाम ही नहीं लेते । चूंकि ये सीरियल लोगों की जिन्दगी के विभिन्न पहलुओं को दर्शाते हैं, इसलिए लोग इनसे गहरे रूप से जुड़े रहते हैं। एक सीरियल की तरफ आकर्षण तब तक रहता है, जब तक वह अपने मूल विषय से जुड़े रहे। लेकिन आजकल  अधिकतर सीरियल कुछ महीनों से ज्यादा दर्शकों को बांध नहीं पाते। दो दशक पूर्व जब दूरदर्शन ही प्रचलित था, तब  केवल तेरह एपिसोड की सीलिंग हुआ करती थी, जो किन्हीं कारणों से ठीक लगती थी। बाद में ढील बरती गयी और ‘चंद्रकांता’ जैसे सीरियलों को बेवजह लंबा खींचने के बाद बंद करना पडम। इस दौरान ‘हम लोग’ और ‘महाभारत’ तथा  ‘रामायण’ जैसे धार्मिक सीरियलों को लोगों ने वर्षो तक पसंद किया। पर आजकल देखा जा रहा है कि सीरियल शुरू तो एक ठोस और विशेष मुद्दे के साथ होते हैं, लेकिन जल्द ही वह अपने विषय से भटक जाते हैं। कहानी में नया मोड़ देने के लिए अचानक किसी नए किरदार का आगमन या किसी किरदार का बिना वजह चले जाना भी दर्शकों को अब उकताने लगा है। यही कारण है कि अच्छी कहानी न होने के कारण शाहरुख खान की कंपनी द्वारा निर्मित ‘घर की बात’ भी बंद होने के कगार पर है। बहुचर्चित सीरियल ‘बालिका वधू’ और ‘बिदाई’ भी अपनी कहानी से भटकते नजर आ रहे हैं। जहां ‘बालिका वधू’ में दो नए किरदार श्याम और गुरु जी का आगमन हुआ, वही ‘बिदाई’ में मालती की  मां का। पर देखने को कुछ नया नहीं मिल रहा है। राह भटकते सीरियलों की श्रेणी मे एक और नाम ‘उतरन’ का भी है, जिसमें दो बच्चों (इच्छा और तपस्या) के बीच का मनमुटाव सिर से परे गुजरने लगा है। न जाने कितने ही एपिसोड से इसकी कहानी टस से मस नहीं हुई। निर्माता शायद भूल जाते हैं कि सीरियल खत्म भी करना होता है। 

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