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पुलिस नाइंसाफी से ही डाकू बना था केवट

पुलिस नाइंसाफी से ही डाकू बना था केवट

उत्तरप्रदेश में चित्रकूट जिले के जमुई गांव में लगभग 400 पुलिसकर्मियों के साथ बावन घंटे तक चली मुठभेड़ में गुरुवार को मारे गए खूंखार डकैत घनश्याम केवट उर्फ नन्हू ने अपनी बहन के दामन को दागदार करने वाले शख्स से बदला लेने के लिए पहली बार बंदूक थामी थी।

घनश्याम की बहन के साथ उसके गांव सुरवल के ही एक युवक बृजभान सिंह ने बलात्कार किया था, जिसकी रिपोर्ट वह राजापुर थाने में दर्ज कराने गया था, लेकिन पुलिस ने उसे डांट-फटकार कर भगा दिया। अपनी बहन के साथ हुए इस हादसे और पुलिस के बर्ताव से बौखलाए घनश्याम ने कोई उपाय नहीं देखकर बदला लेने के लिए बंदूक थाम ली और गांव के ठाकुरों को अपना निशाना बनाना शुरू कर दिया।

घनश्याम ने सबसे पहले 08 दिसम्बर 2003 में अपनी बहन की अस्मत के लुटेरे बृजभान की नृंशस हत्या की और 21 जुलाई 2004 में उसने अपने साथियों के साथ माणिकपुर गांव के एक व्यापारी शिवकुमार केसरवानी की हत्या करने के बाद उसके परिवार के तीन सदस्यों का अपहरण किया। फिर उसने 7 अगस्त 2005 में चंडी गांव में लव सिंह उर्फ पप्पू नाम के व्यक्ति की हत्या कर दी। इन घटनाओं से वह पुलिस की नजरों में चढ़ गया और गिरफ्तारी के लिए सरगर्मी से तलाश की जाने लगी।

पुलिस के विशेष अभियान दल ने 23 मई 2008 और 16 जून 2009 में किसी रिश्तेदार के घर में घनश्याम के होने की भनक लगने पर उसे पकड़ने की कोशिश की थी लेकिन मुठभेड़ में दो पुलिसकर्मी मारे गए और वह बच निकलने में कामयाब रहा। पुलिस ने घनश्याम को जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए उसके सिर पर पहले 10 हजार रुपये का इनाम रखा और बाद में यह राशि बढ़ाकर 50 हजार कर दी, लेकिन अपने गांव और समीपवर्ती गांव के स्वजातियों की परोक्ष और अपरोक्ष सहायता से वह पुलिस को चकमा देकर बच निकलने में कामयाब होता रहा।

पुलिस के रिकॉर्ड के अनुसार अपराध की दुनिया में घनश्याम का नाम 17 जुलाई 2003 में सामने आया जब राजापुर थाने में शंकर केवट गिरोह द्वारा दो बच्चों समेत छह लोगों की सामूहिक हत्या के सिलसिले में दर्ज कराई गई प्राथमिकी में उसका उल्लेख हुआ। अगले चार साल में उसके खिलाफ आठ और मामलों में प्राथमिकी दर्ज कराई गईं।

सन 2005 में राज्य सरकार के डकैत विरोधी विशेष अभियान के दौरान घनश्याम के गिरोह का सरगना शंकर केवट पुलिस के साथ मुठभेड़ में मारा गया। उसके बाद गिरोह की कमान घनश्याम के हाथों में चली गई और उसके अपराधों का ग्राफ बढ़ने लगा। घनश्याम और उसके गिरोह के खिलाफ डकैती, हत्या, अपहरण और फिरौती के 12 से अधिक मामले दर्ज कराए गए।

पिछले साल पुलिस मुठभेड़ में मारे गए पांच लाख रुपये के इनामी डकैत ठोकिया के बंदूक थामने की कहानी भी घनश्याम से मिलती-जुलती है। उसकी बहन की इज्जत पर भी गांव के युवक ने हाथ डाला था, जिसका बदला लेने के लिए उसने अपराध के रास्ते पर कदम रखे।

बहन पर हुए अत्याचार के बाद ठोकिया ने पंचायत में उसकी शादी का प्रस्ताव रखा, लेकिन ठोकिया के कुर्मी समुदाय के स्वजातीय लोगों ने उसके इस अनुरोध को ठुकरा दिया। तब मामला कर्बी कोतवाली में गया, लेकिन वहां भी उसकी अर्जी को रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया। इसके बाद ठोकिया ने बंदूक थाम ली और बदला लेने के लिए जंगल की राह पकड़ ली। लेकिन बहन की आबरू को लूटने वाले को सजा देने की सौगंध वह पूरी नहीं कर पाया और चार अगस्त 2008 में अपने एक साथी ज्ञान सिंह की मुखबिरी से घिर जाने के बाद पुलिस के साथ चार घंटे तक चली मुठभेड़ में मारा गया।

ठोकिया के खिलाफ उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश के आठ जिलों में हत्या, अपहरण और लूटमार के कम से कम 100 मामले दर्ज थे। उसका गैंग इलाके में फिरौती का बड़ा रैकेट चलाने के साथ ही सभी विकास परियोजनाओं से कमीशन वसूल करता था। बीड़ी बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले केंदू पत्ते के कारोबार से भी यह गिरोह धन उगाहता था।

ठोकिया कभी ददुआ के गिरोह का सदस्य था, लेकिन बाद में वह उसके गिरोह से अलग हुए खैरवार गिरोह में शामिल हो गया और 2002 में पुलिस के साथ मुठभेड़ में खैरवार के मारे जाने के बाद गिरोह का सरगना बन गया। आगे चलकर ददुआ गिरोह के कई और सदस्य भी उसके गिरोह में शामिल हो गए थे। यहां एक बात उल्लेखनीय है कि ठोकिया की मां पियारिया देवी ने 2007 में राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) के टिकट पर बांदा जिले के नैरायणी से विधानसभा का चुनाव लड़ा था, लेकिन वह हार गई थी।

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