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बुरा मानो या भला : हम भी वही करेंगे, इंशाअल्लाह!

मैं जब भी पाकिस्तान में बम धमाकों की खबर सुनता हूं, तो सबसे पहले असमां जहांगीर का खयाल आता है। मैं उम्मीद करता हूं कि लाहौर में वह और उनका परिवार ठीकठाक होगा। वहां जब भी कोई गड़बड़ी होती है, तो असमां कहीं न कहीं दिक्कत में होती ही हैं। वह सरकार की मुखालफत करती हैं। मुल्लाओं से टक्कर लेती हैं। हिंदुस्तान से बेहतर रिश्तों की वकालत करती हैं। वह अपने काम के सिलसिले में हिंदुस्तान आती रहती हैं। जब भी उन्हें फुरसत मिलती है, वह मेरे घर चली आती हैं। तब मुझे पाकिस्तान की ताजतरीन खबरें सुनने को मिल जाती हैं।

हाल ही में असमां दिल्ली में थीं। वह दिल की सजर्री कराने आईं थीं। लाहौर लौटने से पहले वह घर आईं। मैं बेहद खुश हुआ। मैंने सवाल किया, ‘पाकिस्तान में क्या चल रहा है?’ उलट कर सवाल आया, ‘क्या जनना चाहते हैं?’
मैंने पूछा, ‘पाकिस्तान समेत दुनियाभर के मुसलमान इतनी आहत और गैरबराबरी क्यों महसूस कर रहे हैं?’ असमां ने सिलसिलेवार बताने की कोशिश की। मसलन, मुसलमानों की ताकत का लगातार कम होना। एक दौर में वे तहजीब और विज्ञान के मसलों में बेहद ऊंचाइयों पर थे। अब वे उस ताकत की गिरावट के लिए बलि के बकरे तलाश रहे हैं।

मैंने जनना चाहा कि उनके समाज में कट्टरपन और मध्यकालीन कायदे-कानून क्यों हावी होते ज रहे हैं? मसलन, बुरका, लड़कियों को पीटना, हाथ-पैर काट डालना, सिर उड़ा देना वगैरह-वगैरह। क्यों नहीं पाकिस्तान का पढ़ा-लिखा तबका उनको उखाड़ फेंकता है? असमां कहती हैं, ‘वे ऐसा कर रहे हैं। तालिबान के खिलाफ समाज में माहौल बन रहा है। हम उनसे आजिज आ चुके हैं। आप जल्द ही उसके नतीजे देखेंगे।’

मैंने कहा, ‘उन्हें मारे बगैर उनका खात्मा कर देना चाहिए। हमने अपने कट्टरपंथियों के साथ ऐसा ही किया है। अब हमारे समाज में फंडुओं की तादाद कम हो गई है। हमने उन्हें इतिहास के कूड़ेदान में डाल दिया है।’
असमां जहांगीर मुस्कुराईं और बोलीं, ‘बहुत खूब। हम भी वही करेंगे। इंशाअल्लाह!’

शीतल मफतलाल

मेरा दिल तो शीतल मफतलाल की तरफदारी कर रहा था। मुंबई एअरपोर्ट पर विदेश से गहने-जवाहरात लाते हुए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। मैं भी इस तरह का काम कर चुका हूं। असल में आप पूरा पैसा दे कर विदेश से कोई चीज ले कर आते हैं और अपने घर में उसके लिए अलग से पैसा देना पड़ता है। मुङो भी कुछ वाकये याद आए।

पहला वाकया कॉलेज के दिनों का है। मैं इंग्लैंड में पढ़ रहा था। एक बार लंदन बोट से आया था। पोर्ट सईद पर मैंने एक जर्मन कैमरा खरीदा। हाल ही में वह बाजर में आया था। दुकानदार ने आधे दाम की रसीद दी। ताकि ब्रिटिश कस्टम को मुङो ज्यादा न देना पड़े। साउथम्पटन में मेरे बैग की जंच हुई। मैंने कैमरा और रसीद दिखाई। कस्टम ऑफिसर ने बैग को खोल कर कैमरा निकाला और उसका दाम बताया। मुङो उसके कहे मुताबिक कस्टम डच्यूटी देनी पड़ी। मैं उसी दिन से उस कैमरे से नफरत करने लगा।

उससे एक भी अच्छा फोटो नहीं खींचा। बाद में उसे बेटे को दे दिया। उसने उसी कैमरे से बेहतरीन फोटो खींचे। बाद के सालों में मेरे ज्यादातर सफर हवाई थे। मैं तब तक कई नुस्खे सीख चुका था। मुंबई में मेरे पास एक लोगो था। उस पर ‘इलस्ट्रेटेड वीकली’ लिखा था। मैं उसका संपादक था। मैंने उसे अपने सूट केस पर लगा लिया था। कस्टम ऑफिसर उसे देख कर रुतबे में आ गया था। मुझसे कोई सवाल नहीं पूछा जता था।

 कभी-कभी जब आपको लगता है कि आप कुछ गलत नहीं कर रहे हैं, तो एक किस्म की अकड़ आ जती है। ऐसा मेरे साथ कोलंबो की कॉन्फ्रेंस से लौटते में हुआ। वहां से हमने कुछ भी नहीं खरीदा था। खरीदने के लिए कुछ था भी नहीं। लेकिन मद्रास में एक महिला कस्टम ऑफिसर ने पकड़ लिया। उसे जब कुछ नहीं मिला, तो उसकी नजर मेरी सोने की रोलेक्स घड़ी पर अटक गई।

मैंने कहा, ‘ये मेरे मरहूम पिता की निशानी है। और उसे पहन कर दुनियाभर में घूम आया हूं।’ लेकिन वह मानने को तैयार नहीं थी। मैंने उससे कहा कि ये क्या बेवकूफी है? उस पर वह उखड़ गई। उसका बड़ा अफसर आया। मैंने कहा, ‘अब आपसे जो हो सके कर लीजिए।’ तब ज कर मसला निपटा। पता नहीं मेरे उखड़ने की वजह से ऐसा हुआ या ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ का लोगो था। उसने माफी मांगी और हम छूट गए।

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