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सच की सच्चाई

दरअसल सत्य और वास्तविकता के अंतर आप सभी जानते तो होंगे, मगर इसकी पहचान सिर्फ मुझे है। वैसे साहित्य में एक और शब्द प्रचलन में है- यथार्थ। अब हमें अंग्रेजी में समझना होगा कि ‘ट्रथ’, ‘रियलिटी’ और ‘एक्चुएलिटी’ में क्या अंतर है। यथार्थ का विलोम तो आदर्श है किन्तु सत्य का अनुलोम वास्तविकता नहीं है।

जैसे रामलीला का आयोजन तो सत्य है किन्तु वास्तविकता ये है कि लीला सम्पन्न होते ही राम का पार्ट खेलने वाला पात्र अपना मुकुट, धनुष, वत्कल और जटाजूट गोदाम में जमा करके वापस अपने धंधे में लग जता है। चूंकि दूध बेचना उसका व्यवसाय है अत: उसका भी अपना सत्य है। वह अब दूध में साधारण पानी नहीं बल्कि एक्वागार्ड द्वारा साफ किया पानी मिलाता है। यानी सत्य और वास्तविकता का भरत मिलाप।

हमारे यहां की रामलीला में रावण का पार्ट एक चौबे जी करते आए हैं। मथुरा के भरपेट हलवाई हैं। कठिन प्रयत्नों के बावजूद उन्हें डाइबिटीज नहीं हो पाई। रावण का रटा-रटाया पार्ट खतम करके वे कनौजिया सेठ के मंदिर में पुजरी के पद पर नियुक्त हैं।

आदतानुसार वे मंदिर में आनेवाली अनेक सीताओं का हरण अपने ग्रामीण नयनों से करते रहे। सत्य तो ये है कि वे स्वभावानुसार रावण हैं और वास्तविकता ये है कि वे पुजारी का आंगिक, वाचिक और आहार्य अभिनय करते-करते सात्विक हो जाते हैं यानी अपने कुकर्मो से अधा जाते हैं। सत्य ये है कि नेता मंत्री पद की शपथ लेते हैं। वास्तविकता ये है कि रजिस्टर पर दस्तखत करते ही शपथ भूल जाते हैं।

अपने शोध के दौरान मैंने एक स्कूल में जाकर छात्रों को कुर्सी और मेज दिखा कर पूछा- बताओ ये क्या है। सभी बोले- दिखता नहीं क्या। मेज और कुर्सी है। मैंने प्रतिवाद किया- अरे ये बताओ ये सत्य है या वास्तविकता? छात्र कोरस में बोले- अंग्रेजी में पूछिए प्लीज। मैं फिर बोला- अच्छा ये बताओ ये ‘ट्रथ’ है या ‘एक्चुएलिटी’। सब बच्चे चुप। एक बोला- सर ये एक्युएलिटी है। मैं खुश हुआ। बोला- यानी वास्तविकता। बच्च बोला- सर ये तो नहीं पता।

मैं जरा तेज हो के बोला- अरे अगर ये मेज कुर्सी एक्चुएलिटी है तो ट्रथ क्या है। सत्य क्या है। सब बच्चे बगलें झांकने लगे। कुछ तो भागने लगे। मैंने उन्हें डांट कर बैठाया और आसाराम बापू की तरह उनके मर्म चक्षु खोले कि- बच्चों सत्य ये है कि ये एक भूतपूर्व पेड़ है। बच्चे पहले अवाक, फिर स्तब्ध फिर ताली बजने लगे। मेरे शोध का अध्याय पूरा हुआ। आप ही बताएं जब अदालत में कोई गवाह गीता पर हाथ रख कर सिर्फ सच बोलने की कसम खाता है तो क्या वास्तविकता में झूठ नहीं बोल रहा होता। अत: आप भी वास्तविकता से मतलब रखें। सत्य जाए भाड़ में।

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