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मुद्रास्फीति बनाम महंगाई

जितनी पुरानी अब मुद्रास्फीति के बेहद कम रहने की खबर हो चली है, उतनी ही पुरानी यह हैरानी भी है कि पब्लिक के लिए महंगाई जस की तस रहने के बावजूद आंकड़े गुलाबी कैसे हो जाते हैं! ऐसा क्यों है कि इस एक साल में दर्ज दालों की 17 फीसदी, अनाज की 13 फीसदी और चीनी की तकरीबन 50 फीसदी दामवृद्धि मुद्रास्फीति के सूचकांक में झलक ही नहीं पाती, जबकि आम आदमी का इनसे रोज पाला पड़ता है?

ऐसे तमाम सवालों का जवाब यही है कि भारतीय अर्थतंत्र अपनी महंगाई का आकलन दशकों पुराने एक ऐसे सूचकांक के आधार पर करता है, जो 400 वस्तुओं की लकीर की फकीर बास्केट के थोक मूल्यों से बनता है और जिसमें सेवाओं की कीमतों को शामिल ही नहीं किया जाता।

कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 60 फीसदी के हिस्सेदार सर्विस सेक्टर को सिरे से नकार देना हमारे मुद्रास्फीति आकलन का सबसे अजीबोगरीब पहलू है। क्या कोई कल्पना कर सकता है कि आम आदमी के लिए महंगाई का हिसाब-किताब लगाया जाए और उसमें स्कूल की फीस का, बिजली के बिल का या टेलिफोन सेवा की कीमत का जिक्र तक न हो!

केवल वस्तुओं की कीमतों पर निर्भर होने की विसंगति जितना ही गंभीर यह है कि यह सूचकांक रिटेल कीमतों की बजय होलसेल कीमतों को देखता है, जबकि सब जानते हैं कि होलसेल मार्केट से आम उपभोक्ता नहीं, ट्रेडर खरीदारी करता है। सच तो आमतौर पर गुमनाम रहने वाला उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) दिखाता है जो फिलहाल नौ फीसदी की महंगाई दिखा रहा है।

पिछले साल के किसी कालबिंदु से इस साल के एक कालबिंदु की तुलना से मुद्रास्फीति निकालने की विधि भी एक विसंगति ही है, क्योंकि इससे वसे ही अटपटे नतीजे उभर आते हैं, जैसे इस हफ्ते आए हैं। छह जून 2009 को समाप्त सप्ताह में मुद्रास्फीति के नेगेटिव 1.61 फीसदी पर आने की तकनीकी वजह यही है कि ठीक एक साल पहले के जिस कालखंड से तुलना हुई वह 11.66 प्रतिशत की असाधारण तेजी दिखा रहा था और ऊंचे आधार  के कारण ताज आंकड़े को नेगेटिव रहना ही था। उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार अर्थशास्त्रियों के एक बड़े वर्ग के इस सुझव को अब गंभीरता से लेगी कि एक समग्र मुद्रास्फीति सूचकांक विकसित करने का वक्त आ गया है। ऐसा सूचकांक जो बाजर की हकीकत से छत्तीस का आंकड़ा न रखता हो।

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