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सरोद के जादूगर

उस्ताद अली अकबर खान के भारतीय संगीत में योगदान को अगर आंकना है तो यही कहा जा सकता है कि सरोद वादन उनके पहले और उनके बाद बिल्कुल है। अगर आज श्रोताओं में वाद्य संगीत, गायन से ज्यादा लोकप्रिय है तो हमें यह भी याद रखना होगा कि एक वक्त वह था जब वाद्य संगीत की कोई खास गिनती नहीं थी।

अक्सर संगीतकारों के उन बेटों को वाद्य बजना सिखाया जता था, जो गा नहीं सकते थे। अगर यह स्थिति बदली है तो इसका सबसे बड़ा श्रेय उस्ताद अलाउद्दीन खान के शिष्यों को जाता है। अली अकबर खान, पंडित रविशंकर, निखिल बनर्जी, पन्नालाल घोष, ये सभी उस्ताद अलाउद्दीन खान के शिष्य थे।

अली अकबर खान के पहले बीसवीं शताब्दी में पंडित राधिका मोहन मोइत्रा, उस्ताद हाफिज अली खान और अली अकबर खान के पिता और गुरु उस्ताद अलाउद्दीन खान जसे सरोद वादक थे लेकिन अली अकबर खान ने सरोद वादन को एक दूसरे ही धरातल पर खड़ा कर दिया, और इसे जनप्रिय भी बनाया।

भारत में तो वे लोकप्रिय हुए ही लेकिन विदेशों में भी भारतीय संगीत को लोकप्रिय बनाने में उनका योगदान पंडित रविशंकर से कम नहीं है। एक ही वक्त में अविभाजित बंगाल से यह जो वाद्य संगीत की प्रतिभाओं का विस्फोट हुआ उसकी चमक भारत के साथ-साथ सारी दुनिया में पहचानी गई।

जिस वक्त महाराष्ट्र और कर्नाटक में कंठ संगीत को नए ढंग से परिभाषित किया ज रहा था, उसी वक्त बंगाल से आए ये प्रतिभाशाली संगीतकार वाद्य संगीत का स्वरूप बदल रहे थे। पंडित रविशंकर जहां अपनी निर्विकार प्रतिभा और ज्ञान के बावजूद अनेक वजहों से विवादास्पद रहे, अली अकबर विवादों से दूर ही रहे।

उनका संगीत हमेशा गंभीर और भव्य बना रहा। अली अकबर खान का तकनीकी कौशल तो लाजवाब ही था लेकिन उनके संगीत की सृजनात्मक ऊंचाई और गहराई के चलते वह अलग से लक्षित नहीं होता था। वे शिल्पगत कुशलता से श्रोताओं को अचंभित कर सकते थे लेकिन श्रेता उनकी संगीत उसके रस में डूबने के लिए ही सुनते जते थे। आज अगर भारतीय संगीत का परिदृश्य इतना समृद्ध और विविधतापूर्ण है तो इसका बहुत बड़ा श्रेय बाबा अलाउद्दीन खान के गुरुकुल को जता है, जो पूर्वी बंगाल से मध्य प्रदेश के मैहर में आ बसे थे। अली अकबर उस परंपरा के समर्थ वाहक थे।

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