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खतरे में हैं गोरी गंगा घाटी के आर्किड

पर्यावरण संरक्षण सहयोगी हिमालयी क्षेत्र में पाए जाने वाले आर्किड पर भी खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। गोरी गंगा क्षेत्र में कम से कम यह स्थिति बन रही है। विकास के नाम पर चल रही गतिविधियां इसके लिए नुकसान देय साबित हो रही हैं।


आर्किड यानि परजीवी पौंधे जल संरक्षण सहित पर्यावरण के हितेषी बताए जाते हैं। उत्तराखंड की बात करें तो यहां दौ सौ प्रजाती के आर्किड पाए जाते हैं। पिथौरागढ़ का गौरी गंगा क्षेत्र इसके लिए धनी कहा जा सकता है। अकेले इस क्षेत्र 120 से अधिक प्रजाति के परजीवी पौंधे पाए जाते हैं। कुमाऊं विवि के युवा वैज्ञानिक डा. जीवन सिंह जलाल क्षेत्र में पिछले कुछ सालों से इस को लेकर शोधरत हैं। डा. जलाल के अनुसार इस क्षेत्र में तीन प्रकार के परजीवी पौंधे पाए जाते हैं। इनमें कुछ पेड़ों पर उगते हैं तो कुछ जमीन पर। यहां मृत पड़े कीड़े मकौड़ों व सड़ी गली चीजों पर पैदा होने वालों को तीसरी श्रेणी में रखा जा सकता है।


इन पौंधों का उपयोग स्थानीय स्तर उपचार के लिए किया जाता है। लोग हरजोजन व भालू का कैला नाम से पाए जाने वाले आर्किड का इस्तेमाल करते आ रहे हैं। यहां पाए जाने वाले जो दजर्न से अधिक आर्किड वर्तमान में संकट के दौर से गुजर रहे हैं। कुछ समय से क्षेत्र से इनको नहीं देखा जा रहा है।


डा. जलाल के अनुसार कारोइलोजि,ट्राइफिडा,इंड्रोलिया जैसे परजीवी पोंधों का अस्तित्व समाप्ति पर है। यहां आर्किड पर गहराते संकट से निपटने के लिए उनके द्वारा अंतराष्ट्रीय संस्थाओं के माध्यम से संरक्षण के कदम भी उठाए गए हैं। स्थानीय लोगों में भी प्रकृति की इस अनमोल धरोहर के लिए जगरूकता पैदा की जा रही है। क्षेत्र में निर्माणाधीन हाईड्रो प्रोजेक्टों को भी इसके लिए नुकसानदेय बताया जा रहा है।



इको टूरिज्म के लिए मुफीद
परजीवी पौंधों में खिलने वाले खूबसूरत फूल खासे आकर्षण का केंद्र होते हैं। डा.जीवन सिंह जलाल का मानना है कि गोरी गंगा क्षेत्र को इको टूरिज्म के रूप में विकसित कर प्रकृति प्रदत्त इस खूबसूरती को प्रकृति प्रेमियों तक पहुचाने का प्रयास किया जा सकता है। इससे स्थानीय लोगों को आर्थिक लाभ मिल सके।

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  • Web Title:खतरे में हैं गोरी गंगा घाटी के आर्किड