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बोलें जरूर.....मगर सुरीला बोलें

बोलें जरूर.....मगर सुरीला बोलें

बातों का सिलसिला कभी खत्म नहीं होता और न ही इसके विषय खत्म होते हैं, लेकिन बातें अगर संतुलित तथा उपयोगी हों तब ही उनकी सार्थकता होती है। टॉक द टाक डे पर  विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोगों ने इस बारे में अपने विचार रखे।

एक सरकार स्कूल में कार्यरत शिक्षिका प्रमिला मेहता ने कहा कि कहा जाता है कि महिलाएं बहुत बोलती हैं। ऐसा नहीं है। बोलते पुरूष भी हैं। बोलना जरूरी है, लेकिन अगर सोचसमझ कर बोला जाए तो बात नहीं बिगड़ती अन्यथा आपके अच्छे खासे रिश्ते में दरार आ सकती है।

मेहता ने कहा कि मैं शिक्षिका हूं। बिना बोले तो मेरा काम चल ही नहीं सकता। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं गैरजरूरी बोलूं। मुझे बच्चों को बोल कर समझाना होता है। बोलते समय मुझे यह ध्यान रहता है कि बच्चे छोटे हैं और उस उम्र में वह जो समझ सकते हैं मैं उसी तरह से बोलूं।

हंसराज कॉलेज की छात्रा प्रगति मिश्र कहती हैं कि अगर बातचीत न की जाए तो बोरियत हावी होते देर नहीं लगेगी। उन्होंने कहा बातचीत के जरिये हम अपनी समस्याओं का हल निकाल सकते हैं। बिना बोले किसी को पता कैसे चलेगा कि हमें कौन सी समस्या है। अपनी पीड़ा भी अगर दूसरों को बता दी जाए तो दुख हल्का हो जाता है।

उन्होंने कहा कि अकेले ही अगर उधेड़बुन में उलझे रह जाएंगे तो अवसाद के शिकार हो जाएंगे। तब सिर्फ दवा और डॉक्टर रहेंगे तथा साथ रहेगी उपेक्षा की भावना।
 

स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. रजनी दत्ता कहती हैं कि बातें करने में बुराई नहीं है। लेकिन बोलने के साथ-साथ सुनना भी चाहिए। जब तक आप अच्छे श्रोता नहीं होंगे तो आप सामने वाले की बात अच्छी तरह समझ नहीं सकेंगे।

उन्होंने कहा मेरा पेशा ऐसा है कि मुझे मरीज की बात ध्यान से सुननी पड़ती है। अगर मुझे लगता है कि कोई बात मुझे ठीक से समझ नहीं आई तो मैं मरीज से दोबारा पूछती हूं। ऐसा उसके इलाज के लिए जरूरी भी है। उसकी समस्या को पूरी तरह समझ कर ही इलाज किया जा सकता है। समझने के लिए सुनना जरूरी है।

प्रगति कहती हैं कि संवादहीनता की स्थिति बिल्कुल नहीं होनी चाहिए अन्यथा कई प्रकार की गलतफहमियां उत्पन्न होती हैं। उन्होंने कहा भारत-पाकिस्तान के बीच कहीं न कहीं संवाद के आदान-प्रदान की जरूरत है, इसीलिए तो समग्र वार्ता प्रक्रिया चलाई जा रही है।

प्रमिला मानती हैं कि बच्चों के करीब जाने के लिए मीठा और उपयोगी बोलना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है बिल्कुल छोटे यानी एक साल के बच्चे से संवाद स्थापित करना। शिशु के सामने हम जो कुछ बोलते हैं वह उसे आत्मसात करने की कोशिश करता है, यह बात वैज्ञानिक भी साबित कर चुके हैं। शिशु को हम बोल-बोल कर ही तो सिखाते हैं। वह कहती हैं मीठा बोलना, संयमित बोलना, सोचसमझ कर बोलना और सुनना जीवन के ऐसे उपयोगी पक्ष हैं जिन पर हम अक्सर ध्यान नहीं देते। प्रगति कहती हैं कि बातचीत ही रिश्ते बनाती है और इसी का असंतुलन रिश्ते तोड़ देता है तो फिर मीठा क्यों न बोला जाए।

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