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ऑस्ट्रेलिया में छात्रों पर हमले जिम्मेदार कौन

आस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था में सालाना ढाई अरब डालर का योगदान देने और वहां की शिक्षण संस्थानों को गुलजार करने वाले भारत के नौनिहालों पर नस्ली हमले हो रहे हैं। उनके जिस्म ही नहीं, उनकी आत्मा को भी आहत किया जा रहा है। आस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों की दुर्दशा और शिक्षा के क्षेत्र में भारत सरकार की काहिली को आइना दिखा रहे हैं हमारे राजनय व रक्षा मामलों के विशेष संवाददाता सुशील शर्मा

यह विडंबना ही है कि कभी नालंदा और तक्षशिला जसे विश्वविद्यालयों में विश्व भर के लोगों को ज्ञान से प्रकाशित करने के कारण जगद्गुरु कहलाने वाले भारत के बच्चों को आज शिक्षा के लिए एक ऐसे मुल्क की ओर रुख करना पड़ा है जिसे बसाया ही गया था अपराधियों की आबादी से! बात इतनी ही नहीं है, बात है कि हमारे बच्चों के साथ नस्ली भेदभाव हो रहा है, उन्हें मारा-पीटा और लूटा जा रहा है। हम बात कर रहे हैं ऑस्ट्रेलिया की जिसे करीब ढाई सौ साल पहले ब्रिटेन ने एक ‘पीनल कॉलोनी’ या ‘दंड की बस्ती’ के रूप में बसाया था। जसे अंग्रेज अपने शासन काल में भारत के राजनीतिक कैदियों को दंडित करने के लिए कालापानी (अंडमान-निकोबार) भेजते थे, वसे ही अपराधियों से ठसाठस भर जाने के कारण ब्रिटेन के अपराधियों को ऑस्ट्रेलिया भेज गया। ऑस्ट्रेलिया धरती के पेंदे (दक्षिणी गोलार्ध के नीचे की ओर) में बसा होने के कारण ‘डाउन अंडर’ भी कहलाता है। यहां लाए गए बहुत से अपराधी सज काटने के बाद ऑस्ट्रेलिया में ही बस गए और आज यह मुल्क काफी तरक्की करते हुए शिक्षा का एक प्रमुख केन्द्र बन गया है। इसी ऑस्ट्रेलिया में अब नस्ली भेदभाव की भावना इतनी प्रखर हो गई है कि वहां पढ़ रहे करीब 97 हजर भारतीय छात्रों (कुल अंतरराष्ट्रीय छात्रों का 18 प्र.श.)  के साथ आए दिन कोई न कोई अपमानजनक हादसा हो रहा है।

दुनिया को कढ़ी और सब्जी का स्वाद देने वाले भारतीयों की पहचान आस्ट्रेलिया में ‘करी’ के रूप में की जाती है और उनकी पिटाई को ‘करी बैशिंग’ यानी ‘करी’ की पिटाई नाम दिया गया है।

ऑस्ट्रेलिया को दोष देने से पहले जरा हम अपनी खामियों पर भी नजर डालें। करीब दो करोड़ लोगों की आबादी वाला ऑस्ट्रेलिया चार साल के लिए पांच अरब 70 करोड़ डालर का प्रावधान कर रहा है, वहां एक अरब 20 करोड़ की आबादी वाले भारत ने शिक्षा के सालाना बजट को 2 अरब 22 करोड़ डालर से बढ़ा कर 2 अरब 79 करोड़ डालर किया है यानी सालाना बजट में मात्र 57 करोड़ डालर की वृद्धि। 

कमाई का तीसरा बड़ा जरिया

ऑस्ट्रेलिया में इस समय करीब पांच लाख विदेशी छात्र हैं। शिक्षा निर्यात से ऑस्ट्रेलिया को कुल साढ़े 15 अरब डालर की आय होती है जो लोहे और कोयले के निर्यात के बाद कमाई का तीसरा बड़ा जरिया हैं। इसमें भारतीय छात्रों से उसे सालाना करीब ढाई अरब डालर की कमाई होती है। यदा कदा अन्य देशों के छात्रों से भी मार-पीट की जाती, लेकिन भारतीय लोग आसान शिकार माने जाते हैं। कुछ वर्ष पहले समुद्री तट पर लेबनानियों और ऑस्ट्रेलियाइयों के बीच झगड़ा हुआ था जिसमें दो-तीन ऑस्ट्रेलियाई मारे गए थे। बाद में भी कई बार हुए झगड़ों में लेबनानियों ने ऑस्ट्रेलियाइयों की जमकर धुनाई की। लेबनानी समूह में उनका मुकाबला करते हैं। लेकिन भारतीय छात्र अपनी पढ़ाई और काम में व्यस्त रहते हैं। चूंकि वे पार्ट टाइम काम करते हैं, लिहाज उनके पास कुछ पैसा भी होता है। एक तो ऑस्ट्रेलियाई किशोर उग्र स्वभाव के होते हैं, ऊपर से आर्थिक मंदी से उनका हाथ भी तंग हो गया है। लिहाज वे लूट-पाट के जरिए भारतीय छात्रों से पैसा हड़पने के लिए मार-पीट करते हैं। अब तो वे जानलेवा हमले करने लगे हैं।

ज्यादातर छात्र गरीब या साधारण परिवारों से हैं जो ऑस्ट्रेलिया में स्थाई नागरिकता चाहते हैं। वहां जीवनयापन का खर्च इतना ज्यादा है कि उन्हें पढ़ाई के बाद पार्ट टाइम काम करने जना पड़ता है। देर रात को ट्रेन से लौटते हुए या सुनसान गलियों में उनकी दिहाड़ी लूटने के लिए ऑस्ट्रेलियाई गुंडे फिराक में बैठे रहते हैं। भारतीय छात्र मजबूरी के चलते कम वेतन पर काम कर लेते हैं। इससे ऑस्ट्रेलिया के युवकों को लगता है कि वे उनका काम छीन रहे हैं। नस्ली हमले का यह भी प्रमुख कारण है। उल्लेखनीय है कि 1973 तक ऑस्ट्रेलिया में गैर-गोरों का प्रवेश वजिर्त था। लेकिन जब वहां की सरकार ने बड़ी संख्या में शिक्षण संस्थान खोल दिए, लेकिन जब देखा कि अपने देश में इतने छात्र नहीं जो इनका फायदा ले सकें तब ऑस्ट्रेलिया ने विदेशी छात्रों को बुलाना शुरू किया। गत वर्ष भारतीय छात्रों को आकर्षित करने के लिए चलाए गए अभियान पर ऑस्ट्रेलिया ने साढ़े तीन करोड़ डालर खर्च किए। और जब हमारे छात्र वहां जते हैं, उनकी अर्थव्यवस्था में फीस, आने-जने पर खर्च और अन्य जरूरतों पर खर्च के साथ ही मेहनत करते हुए महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं, तब उनके साथ नस्ली भेदभाव किया जाता है। पहले तो ऑस्ट्रेलिया सरकार मानने को ही तैयार नहीं थी कि भारतीयों के साथ नस्ली भेदभाव हो रहा है। अब दबी जुबान मान रही है कि कई मामलों में ऐसा हो रहा है। भारत में ऑस्ट्रेलिया के राजदूत जॉन मैकार्थी ने स्वीकार भी किया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा ने भी ऑस्ट्रेलिया सरकार के समक्ष यह मामला उठाया। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री केविन रड ने आश्वासन भी दिया और भारतीय छात्रों की सुरक्षा के लिए कुछ कदम भी उठाए लेकिन हमले रुकने का नाम नहीं ले रहे। ऑस्ट्रेलिया को यह डर भी है कि यदि भारतीय छात्रों ने भविष्य में कोई और विकल्प खोज लिया तो उसे भारी आर्थिक नुकसान होंगे। इसीलिए वहां की सरकार इन हमलों को रोकने के प्रति गंभीर नजर आती है। फिर भी छात्रों का डर कम नहीं हो रहा। कई छात्रों ने कहा है कि ऑस्ट्रेलिया की पुलिस सूचना देने के बाद भी काफी देरी से पहुंचती है और उनकी मदद नहीं कर रही।  सवाल उठता है कि इस घृणित माहौल में हमारे बच्चों को कब तक छोड़ा जा सकता है? कब तक मां-बाप बच्चों के उज्जवल भविष्य का सपना देखते हुए उन्हें मौत के मुंह में भेजते रहेंगे? क्या सरकार भारतीय छात्रों की जरूरत पूरा करने के लिए उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने की कोई ठोस नीति अपनाएगी? विदेशी हथियारों पर एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च कर गर्व महसूस करने वाली हमारी सरकार क्या अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए धन की व्यवस्था नहीं कर सकती? विचारक, विद्वान, अर्थशास्त्री, शिक्षा-साक्षरता के पैरोकार हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कब तक भारतीय छात्रों की दुर्दशा देखते रहेंगे? क्या छह जुलाई को बजट पेश करते समय वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के जेहन में मेलबर्न के अस्पताल में एक महीने से ज्यादा समय से बेहोश पड़े श्रवण कुमार का चेहरा और उसके अभिभावकों का संताप होगा?  एसोचेम की एक रिपोर्ट के मुताबिक हर वर्ष करीब पांच लाख भारतीय छात्र विदेशों में पढ़ने के लिए जते हैं जबकि भारत में पढ़ने वाले विदेशी छात्रों की संख्या सिर्फ 27 हजर है। इस तरह सालाना दस अरब डालर की रकम भारत के हाथ से निकल जाती है। यदि सरकार सालाना इससे आधी रकम भी उच्च शिक्षा की सुविधाओं पर खर्च करे तो काफी बचत हो जएगी। विदेश जने का एक आकर्षण मोटी नौकरी और एनआरआई का स्टेटस भी है। लेकिन आर्थिक मंदी के इस दौर में यह आकर्षण भी धुंधला हो गया है। दूसरी ओर, भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है और यदि भारतीय टैलेंट को भारत में ही बेहतर अवसर मिलते हैं तो लाभ देश को ही होगा।

शिक्षण संस्थानों को नियंत्रण मुक्त करना भी उपाय

बड़ी तादाद में भारतीय छात्रों का विदेश पढ़ने जाने का प्रमुख कारण है कि भारतीय उच्च शिक्षण संस्थानों में सीटों की कमी। यदि अच्छे निजी शिक्षण संस्थानों को प्रोत्सहित किया जए तो बाहर जने की जरूरत नहीं होगी। सार्वजनिक-निजी भागीदारी के आधार पर भी यदि अच्छे शिक्षण संस्थान खुलें और उन्हें डिरेगुलेट किया जए तो यह ट्रेंड बदल सकता है। भारत में उच्चशिक्षा को इतना सब्सिडाइज्ड किया हुआ है कि किसी ख्याति प्राप्त उच्च शिक्षण संस्थान में पढ़ने का मासिक खर्च सिर्फ डेढ़ सौ डालर आता है जबकि अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन या ऑस्ट्रेलिया में यह खर्च 1500 से 5000 डालर प्रति माह आता है। इसके बावजूद भारतीय छात्र इतनी बड़ी तादाद में वहां जाते हैं। यदि दो करोड़ की आबादी वाला आस्ट्रेलिया शिक्षा के क्षेत्र को एक व्यापारी की भाषा में एजुकेशन एक्सपोर्ट मान कर उसमें निवेश कर सकता है तो 100 करोड़ की आबादी वाले देश की एक अर्थशास्त्री के नेतृत्व वाली भारत की सरकार इस आसान गणित को नहीं समझ पा रही। सिर्फ सिक्कों के पहियों पर चलने वाली दुनिया की नजर में आज यदि शिक्षा तिजारत ही बन गई है तो व्यापारियों का देश भारत क्यों नहीं इस क्षेत्र को उसी नजरिए से देख पा रहा है?


हमलों की वजह

विक्टोरिया पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2007-08 में भारतीय मूल के लोगों पर 1447 हमले हुए। इसी माह 15 से ज्यादा हमलों की रिपोर्ट दर्ज की गई है। बहुत से मामले तो दर्ज ही नहीं होते। पिछले दो महीनों में इन नस्ली हमलों में काफी तेजी आई है।

दब्बू होने के कारण भारतीय छात्रों पर हमले करने वालों में लेबनानी, चीनी, एबोरिजिन (आदिम ऑस्ट्रेलियाई) और अफ्रीकी लोग भी देखे गए हैं। भारतीय छात्रों की कमजोरी है कि वे अन्य देशों के लोगों से मेलजोल बढ़ाने के बजाय भारतीयों के साथ ही ज्यादा मिलना-जुलना पसंद करते हैं। कुछ मामलों में अपने पास लैपटॉप, आईपॉड, मोबाइल फोन, कार या अन्य महंगे इलेक्ट्रोनिक गैजेट्स का प्रदर्शन भी उनके लिए नुकसानदेह हो जाता है। मोबाइल पर अपनी भाषा में जोर-जोर बात करना या पार्टीबाजी का दिखावा भी उनके लिए घातक हो जाता है। हमलावरों में नशेड़ी भी शामिल होते हैं जिनका मकसद सिर्फ कैश लूटना होता है लेकिन ज्यादातर मामलों में नस्ली भावना से प्रेरित गुंडे हमले करते हैं।


घटते रोजगार, बढ़ती निराशा

ऑस्ट्रेलिया में 2008 में 2007 के मुकाबले नामांकन करने वाले छात्रों की संख्या में 54 प्रतिशत इजाफा हुआ है।

इसी दौरान अमेरिका में भारतीय छात्रों की संख्या में सिर्फ 13 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।

जनवरी,07 में आस्ट्रेलिया में 10,033,480 लोगों को रोजगार मिले। बेरोजगारी की दर 2007 में 4.6 प्रतिशत थी, तो अप्रैल 09 में  5.4 प्रतिशत हो गई।

फरवरी 09 में ऑस्ट्रेलियन ब्यूरो ऑफ स्टेटिस्टिक्स के आंकड़ों के अनुसार वहां फुलटाइम नौकरियों कम हुई, तो पार्ट टाइम जॉब बढ़ी।

पिछले पांच वर्षो में ऑस्ट्रेलिया पढ़ने जाने वाले छात्रों की संख्या तीस हजर से बढ़कर 97,000 हो गई।

तकरीबन 45,000 भारतीय छात्र मेलबर्न में रहते हैं, तो 32,000 एडीलेड में, शेष सिडनी, ब्रिसबेन और पर्थ में रहते हैं।

2007-08 के दौरान ऑस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था में अंतरराष्ट्रीय शिक्षा का योगदान 13.7 अरब ऑस्ट्रेलियन डॉलर था।

ऑस्ट्रेलिया में चीन के बाद सबसे ज्यादा छात्र भारत से आते हैं। वर्तमान में उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक ऑस्ट्रेलिया में 1,30,000 चीनी छात्र हैं।

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