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मंदी से अकस्मात उपजा आस्ट्रेलिया का नस्लवाद

ऑस्ट्रेलिया में पिछले कुछ दिनों से भारतीय छात्रों पर हो रहे हमलों ने विश्व समुदाय को झकझोर कर रख दिया है। विश्व के प्रमुख हलकों में नस्लीय हमलों के पीछे मंदी को प्रमुख कारण माना जा रहा है। इसमें कोई शक नहीं कि पिछले दो दशकों में भारतीय मेधा का लोहा पूरे विश्व ने माना है। देश ही नहीं, विदेश में भी भारतीय युवाओं ने कई ऐतिहासिक उपलब्धियां अíजत की हैं, ऐसे में विश्व के विकसित देश भारतीय युवाओं के बढ़ते वर्चस्व को लेकर खासे चिंतित हैं।

हाल में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने देश के युवाओं को लगभग चेतावनी देते हुए कहा था कि भारतीय युवाओं से उन्हें बहुत कुछ सीखना बाकी है, वरना वश्विक प्रतिस्पर्धा में वे पिछड़ जाएंगे। इसके पीछे कुछ कारण स्पष्ट नजर आते हैं। आंकड़े कहते हैं कि ऑस्ट्रेलिया में चीन के बाद सबसे ज्यादा छात्र भारत से आते हैं, साथ ही पिछले कुछ वर्षो में वहां भारतीय छात्रों ने काबिलियत का बेजोड़ प्रदर्शन किया है जिससे ऑस्ट्रेलिया के छात्र असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

वहीं वर्तमान की वश्विक मंदी ने इस आग में घी डालने का काम किया। ऑस्ट्रेलिया में बेरोजगारी की दर जहां 2007 में 4.6 प्रतिशत थी, तो 2009 में अप्रैल में बढ़कर 5.4 प्रतिशत हो गई। इसने ऑस्ट्रेलिया के नवयुवकों के चेहरे पर चिंता की लकीरें खींच दी, उन्हें ऐसा महसूस होने लगा कि काबिलियत के बलबूते भारतीय छात्रों को पछाड़ पाना आसान नहीं होगा। अतः ऑस्ट्रेलियाई छात्रों की निराशा का सामना भारतीय छात्रों पर हमले के रूप में सामने आया। इतिहास इस बात का हमेशा से गवाह रहा है कि बेरोजगारी और हताशा जुर्म को बढ़ावा देती है। हालांकि ऑस्ट्रेलियाई अधिकारी अपने देश को नस्लवादी नहीं मानते, वे कहते हैं कि अमेरिका और इंग्लैंड की तरह यहां एक नया बहुनस्लीय समाज आकार ले रहा है।

इससे पहले आमतौर पर वहां ऐसा नस्लीय टकराव कभी देखने को नहीं मिला। दूसरा बड़ा कारण ये भी है कि आमतौर पर प्रतिभाशाली भारतीय कर्मचारी सस्ते उपलब्ध हो जते हैं। विकसित देशों को इस दौर में भारत की ‘सक्सेस और ग्रोथ स्टोरी’ से सीखने और उसका हिस्सा बनने की जरूरत है, न कि बर्बरता से उसका विरोध करने की।

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