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सौ दिनों का एजेंडा और ढे़र सारे सवाल

हाल ही में हुए संसद के विशेष सत्र में सरकार ने अपने अगले सौ दिन के कामकाज की रूपरेखा पेश की। सौ दिन का यह मॉडल मूल रूप में अमेरिका से लिया गया है, जहां नया राष्ट्रपति पहले तीन महीनों में ऐसे कदम उठाता है, जिसका असर लोगों को तुरंत दिखाई दे। भारत में इस मॉडल को अपनाने के फायदे भी हैं और इसमें कई मुश्किलें भी हैं। फायदा यह है कि सरकार अगले तीन महीने का अपना अनुशासन खुद तय कर लेती है। अगर इन तीन महीनों में काम गति पकड़ लेता है तो इस गति के आगे भी बरकरार रहने की उम्मीद की जा सकती है। लेकिन अगर वायदे पूरे करने में कसर रह गई तो पहले तीन महीने में ही सरकार की साख पर बट्टा लग जाता है।
 
सत्र में हुए राष्ट्रपति के अभिभाषण में सरकार ने ढेर सारे दूसरे वादे भी किए हैं। संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने और पंचायतों व स्थानीय निकायों में 50 फीसदी आरक्षण देने का असर दूरगामी होगा। इसके अलावा पिछड़ा क्षेत्र सहायता कोष, नरेगा जैसी योजनाओं का सोशल ऑडिट, मॉडल नागरिक सेवा कानून बनाना, ज्ञान आयोग की सिफारिशों के हिसाब से उच्च शिक्षा के लिए राष्ट्रीय परिषद् बनाना, खाद्य सुरक्षा कानून को लागू करने के लिए गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों के लिए विशेष पहचानपत्र बनाना जसे कई और वादे भी इसमे शामिल थे। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण घोषणा है, अगले दस साल को रचनात्मकता दशक के रूप में मनाने की। इसका अर्थ है लोगों की कुदरती रचनात्मकता के सामने आने वाली बाधाओं को दूर करना, नए विचारों और पहल को प्रोत्साहित करना। यह काम कार्यस्थल पर भी होना चाहिए, स्कूलों में भी, और विश्वविद्यालयों में भी। इसके लिए हमें व्यवस्था में जोखिम लेने, नाकामी को स्वीकार करने और उससे सीख लेने की क्षमता भी विकसित करनी होगी।

दूसरी बात गरीबी से जुड़ी हुई है। हमारी आबादी में कितने गरीब हैं, इसे लेकर काफी विवाद है। किस्म- किस्म के आंकड़ें हैं। सरकार के आंकड़े, विश्व बैंक के आंकड़े और एशियन डेवलपमेंट बैंक के आंकड़ें। लेकिन ये सारे आंकड़ें यही बताते हैं कि विकास का लाभ नीचे तक नहीं पहुंचा है। विश्व बैंक ने चेतावनी दी है कि खाद्यान्न की कीमतें बढ़ने के कारण गरीबी बढ़ सकती है और हमने गरीबी से जंग में जो थोड़ा-बहुत भी हासिल किया है, उसे खो सकते हैं। इन सारी समस्याओं को देखते हुए सरकार को एक ‘गरीबी उन्मूलन और आकलन आयोग’ बनाना चाहिए, जो अगले छह महीनों में अपनी रिपोर्ट दे। गरीबी हटाने का मामला जितना अर्थशास्त्र का मामला है उतना ही यह राजनीति का है। इसके लिए हमें आयोग में विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं के लोगों को रखना चाहिए, ताकि गरीबी उन्मूलन हमारी विकास रणनीति का मुख्य बिंदु बने।

तीसरी बात यह कि गरीबों के लिए हमारे पास ढेर सारी योजनाएं हैं, बहुत सी तो एक जैसी हैं। ढेर सारी योजनाओं के बजाए गरीबों को सीधे नगद आर्थिक मदद का रास्ता अपनाया जा सकता है। ब्राजील जैसे कई देशों ने यह तरीका अपनाया भी है। इसके अलावा हमें खाद्य सुरक्षा कानून को खत्म कर देना चाहिए, इसके बजाए हमें राष्ट्रीय आजीविका एक्ट बनाना चाहिए, जो भोजन की गारंटी से कहीं आगे जाएगा। इससे गरीबों की जिंदगी को एक सम्मान भी मिलेगा।

चौथी बात कृषि की है। हैरत है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण में इसका कहीं जिक्र नहीं है। लेकिन अगर हमें कृषि की उत्पादकता बढ़ानी है और राष्ट्रीय विकास परिषद में अपनायी गई विशेष कृषि कार्ययोजना को लागू करना है तो हमें कर्ज माफी जैसी योजनाओं के बजाए, कृषि कर्ज की उपलब्धता को बढ़ाना होगा। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में यह काम लगभग नहीं ही हुआ है। सरकार को इसके लिए एक एग्रीकल्चर क्रेडिट एक्सेस एंड डिस्बर्समेंट एक्ट बनाना चाहिए। इसमें 20 से 40 फीसदी तक कर्ज छोटे और सीमांत किसानों को देने का प्रावधान होना चाहिए। इसके अलावा कृषि कर्ज पर सब्सिडी की व्यवस्था भी करनी चाहिए, ताकि किसानों को चार फीसदी ब्याज दर पर कर्ज मिल सके।

पांचवां यह कि केंद्र और राज्य के रिश्तों को नए ढंग से गढ़ना होगा। वे सारे प्रस्ताव और कार्यक्रम जिनका भार आखिर में राज्य को वहन करना पड़ता है, उनके लिए पहले राज्य से सहमति ली जनी चाहिए। केंद्र अक्सर नए खर्चो के ऐसे बहुत से प्रस्तावों को राज्य से बातचीत के बिना ही स्वीकार कर लेता है, जिसका असर राज्य के वित्तीय संसाधनों पर पड़ता है। पूर्व सहमति से हमारी संघीय व्यवस्था ही मजबूत होगी।

छठा मसला पिछड़े क्षेत्रों की मदद का है। क्या सरकार सामाजिक व क्षेत्रीय गैरबराबरी और इन्हें दूर करने की योजनाओं पर एक श्वेत पत्र ला सकती है। यह मामला बिहार की उस मांग से भी जुड़ा हुआ है, जिसमें कहा गया है कि कम टैक्स बेस, कम प्रति व्यक्ति आय, कम ऊर्जा व संपत्ति उपभोग के कारण बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिया जाना चाहिए। खासतौर पर झारखंड के बिहार से अलग हो जाने के बाद के हालात को देखते हुए। आर्थिक और नैतिक दोनों ही आधार पर यह मांग जायजा है। कुछ दूसरे राज्यों की भी ऐसी ही मांग होगी।

सातवां मामला विनिवेश का है, जिसमें हमें कई अतंरविरोधों से निपटना है। हमें इसका मकसद तय करना है। क्या यह राजस्व बढ़ाने का जरिया है? या उत्पादकता बढ़ाने का। इसके लिए अगर हम कोई अच्छी कार्ययोजना बनाना चाहते हैं तो इस पर एक श्वेतपत्र तैयार करना चाहिए। मैं इसके खिलाफ नहीं हूं, लेकिन विनिवेश करते समय हमें यह तो सोचना ही चाहिए कि हम क्या हासिल करना चाहते हैं।

आठवां मामला ऊर्जा क्षेत्र के सुधारों का है। जिससे तेल की कीमतों का मामला भी जुड़ा हुआ है। अब समय आ गया है कि सरकार को इस पर से नियंत्रण खत्म कर देना चाहिए। हमें एक समझदारी भरी एकीकृत ऊर्जा नीति बनानी होगी। इसके बिना हम कोई पर्यावरण नीति नहीं बना सकते। और ऊर्जा नीति को बनाने से ज्यादा उलझनें उसे लागू करने पर होंगी, जिसके लिए हमें राष्ट्रीय ऊर्जा बोर्ड बनाना चाहिए।

नवां मामला इन्फ्रास्ट्रक्चर का है और हर कोई जनता है कि इस दिशा में क्या होना बाकी है। राज्य सरकारों को इसके फैसले करने का अधिकार दिया जना जरूरी है। हमें यह भी देखना है कि इस मामले में निजी सार्वजनिक भागीदारी का रास्ता क्यों नहीं कामयाब हो रहा।

प्रधानमंत्री ने एक नई शुरुआत की बात की है। नई शुरुआत में संसद की विशेष भूमिका होगी। परमाणु समझोते के वक्त संसद में जिस तरह की बाधाएं आईं वैसी समस्याएं फिर न आए इसके लिए पहले से ही तैयारी करनी होगी।

nandu@nksingh.com
लेखक राज्यसभा सदस्य और जाने-माने अर्थशास्त्री हैं, वे केन्द्र सरकार में सचिव रह चुके हैं

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