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लालगढ़ की लड़ाई

पश्चिम बंगाल के लालगढ़ और उसके आसपास के इलाके में जो कुछ हो रहा है उसके बारे में यह कहा जा सकता है कि वाम मोर्चा सरकार ने पिछले तीन साल में जो बोया है, उसी को वह काट रही है। नक्सलवादियों ने स्थानीय लोगों के साथ मिलकर माकपा के इस गढ़ पर हमला बोल दिया है और न माकपा के कॉडर, न ही स्थानीय प्रशासन और पुलिस कुछ कर पा रही है। लगातार राजनैतिक हस्तक्षेप की वजह से राज्य पुलिस में वह दमखम और कार्यकुशलता नहीं है कि ऐसे हमले का सामना कर पाए और माकपा के स्थानीय नेता और कार्यकर्ता आम जनता के ऐसे आक्रमण से हक्काबक्का रह गए हैं। वाम मोर्चे के नेता ऑपरेशन बर्गा और भूमि सुधारों का गुणगान करते नहीं थकते, लेकिन ऐसा लगता है कि उसके बाद वाम मोर्चे की सरकार ने कुछ नहीं किया। पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाकों में बेहद गरीबी है और तमाम सरकारी काम वाम पार्टियों के स्थानीय नेताओं को सौंप दिए गए हैं, जो मनमानी और भ्रष्टाचार करते हैं। ऐसे में नक्सलवादियों ने अपनी पैठ बना ली। राज्य सरकार इस डर से उनके खिलाफ कार्रवाई करने से बचती रही कि नंदीग्राम जसी घटना न हो जए, और अब स्थिति यह आ गई कि नक्सलवादियों ने वाम मोर्चा और सरकार दोनों की मशीनरी को इस इलाके से खदेड़ दिया।

यह भी कोई छिपी बात नहीं है कि तृणमूल कांग्रेस के लोगों का प्रत्यक्ष या प्रच्छन्न समर्थन भी उनके साथ है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि वाम मोर्चा इतने साल तक सशस्त्र कॉडर के सुव्यवस्थित नेटवर्क के सहारे राज करता रहा और वहां शांति इसलिए रही कि पुरजोर विरोध करने वाली कोई ताकत नहीं थी। अब जो गतिरोध की ताकतें खड़ी हो रही हैं, वे वाम मोर्चे के तरीकों से ही उसे जवाब दे रही हैं। खतरा यह है कि यह हिंसा तेज हो सकती है और पश्चिम बंगाल के बाकी हिस्सों में भी फैल सकती है।

दरअसल अपने कार्यकाल में वाम मोर्चे खास कर माकपा ने जिस तरह समूचे प्रशासन को पार्टी कॉडर के हवाले कर दिया था, उसकी वजह से इस वक्त न प्रशासन न पार्टी, प्रशासनिक या राजनैतिक स्तर पर नक्सलवादियों की चुनौती को ङोल पा रही है। केंद्रीय बलों के सहारे फिलहाल स्थिति नियंत्रण में भले ही आ जाए, लेकिन बुनियादी दिक्कत एक विकासोन्मुख और तटस्थ प्रशासनिक ढांचे के न होने की है, जब तक वह नहीं बनता, पश्चिम बंगाल में जनता अराजकता और अशांति ङोलती रहेगी।

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