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बातचीत के सूत्र

कुछ उग्र धड़ों को छोड़ दें तो इस बात पर लगभग आम सहमति है कि पाकिस्तान से बातचीत होनी चाहिए। यह राय मनमोहन सिंह की सरकार की भी है, उसके पहले की सरकारों की भी थी। पाकिस्तान में उग्र सोच वाले भारत से बहुत ज्यादा हैं, लेकिन फिर भी वहां का सत्ता प्रतिष्ठान इस धारणा को ही पेश करता है कि भारत पाकिस्तान को अपने आपसी मसले बातचीत से ही सुलझने चाहिए। यही राय अगर आज राष्ट्रपति आसिफ जरदारी की है तो यही पहले परवेज मुशर्रफ की भी थी। यह बात अलग है कि पाकिस्तान के इसी सत्ता प्रतिष्ठान में ऐसे लोग और संस्थाएं भी हैं, जो भारत के खिलाफ आतंकवाद का इस्तेमाल एक रणनीति नहीं, बल्कि एक नीति के रूप में करते हैं। इतने ही नहीं, वे आतंकवाद की ऐसी परिभाषाएं भी गढ़ते हैं जिनसे भारत में आतंक फैलाने वालों को बाकी दुनिया के विरोध से बचाया जा सके। यही वे ताकते हैं, जो अक्सर भारत पाक वार्ता को निर्थक बता कर उन्हें पंक्चर करने की कोशिश भी करती हैं। इसलिए हम जब पाकिस्तान से किसी भी तरह की वार्ता करने से इनकार कर देते हैं तो इसी तरह की ताकतों को मजबूती भी दे रहे होते हैं। पिछले सात महीने हमने बिना वार्ता के ही गुजरे हैं। वार्ता मुंबई में हुए आतंकवादी हमले के बाद तब रुकी थी, जब खबरें आ रही थीं कि सियाचिन और सर क्रीक मसले पर सर्वमान्य समझोता लगभग हो ही गया है। इसके पहले ऐसी बाधा कारगिल युद्ध के दौरान भी आई और संसद पर हुए आतंकी हमले के दौरान भी। मुशर्रफ की विदाई की बेला में भी वार्ता अटक गई थी। खुद हमारे देश में भी सत्ता परिवर्तन के दौरान एक अल्पविराम आया था। अब जब हम फिर से बातचीत की मेज पर बैठने की तैयारी रहे हैं तो ऐसे विराम और बाधाओं के बारे में भी सोचना जरूरी है। पाकिस्तान के बारे में हम भले ही ज्यादा कुछ न कर सकते हों, पर अपनी तरफ से हम वार्ता की प्रक्रिया को शॉकप्रूफ तो बना ही सकते हैं। हम जो बातचीत कर रहे हैं, उसका एक बड़ा मकसद आतंकवाद का अंत करना भी है, इसलिए चंद आतंकवादी वारदात के बाद वार्ता को बंद करने से ज्यादा कुछ हासिल होने वाला नहीं है। इसका अर्थ पाकिस्तान को बख्श देना भी नहीं है। आतंकवाद को सहयोग के लिए पाकिस्तान को कठघरे में खड़े करने और उस पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने का काम वार्ता के साथ भी हो सकता है।

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