class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

किताब-कॉपी बेच गाड़े सफलता के झंडे

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.. सूर्य कांत त्रिपाठी ‘निराला’ की इस कविता का अर्थ समझ जयकिशन ने तमाम संघर्षो से जुझते हुए बारहवीं कक्षा में कामयाबी हासिल की। रात के अंधेरे में जब सारा जग सोता। वह पढ़ाई में मशगूल होता। किताबों की दुकान में नौकरी कर दूसरों को ज्ञान बांटने के साथ खुद भी सफलता के झंडे गाड़े। अब उसका सपना आईआईटी की प्रवेश परीक्षा को पार करना है।  


 परिवार की आर्थिक तंगी ने जय किशन भारद्वाज को चौथी कक्षा से ही नौकरी करने को विवश कर दिया। उसने एनएच-पांच के मुंजल इंटरप्राइजेज बुक एंड स्टेशनरी में कॉपी-किताब बेचने का काम शुरु किया। पारिवारिक जिम्मेदारी उठाते हुए उसने नौकरी और पढ़ाई के बीच सामंजस्य बैठाया और दसवीं कक्षा में 93 प्रतिशत अंक हासिल करे। जबकि बारहवीं में उसने 81 प्रतिशत अंक प्राप्त किए। 


 एनएच-पांच एफ, मकान नंबर 19 में रहने वाले जशकिशन के पिता टीकाराम भारद्वाज पंडित और मां मीरा भारद्वाज गृहणी है। पिता की कमाई से घर का गुजरा संभव नहीं था। इसलिए बड़ी बहन ने बारहवीं की पढ़ाई छोड़ नौकरी शुरु कर दी। बहन का हाथ बढ़ाने के लिए खुद जयशंकर ने चौथी कक्षा से बुक डिपो में काम करना शुरु किया। स्कूल के दौरान वह स्कूल बंद होने और हर संडे दुकान पर काम करने पहुंच जाता। इससे उसकी फीस का खर्चा निकल पाता।


वह बताता है कि उसने पेपर आंरभ होने के कुछ महीने बाद 6-7 घंटे पढ़ाई करना शुरु कर दिया। दिनभर दुकान में काम करने के बाद वह रात के दस बजे पढ़ाई शुरु करता। देर रात जब सब सो जाते वह भोर 4 बजे तक पढ़ाई में मशगूल रहता।

मुंजल इंटरप्राइजेज बुक एंड स्टेशनरी शॉप के मालिक विनोद मुंजल ने बताया कि जयकिशन बहुत होनहार है। उसकी इमानदारी को देखते हुए वह उसकी हर संभव मदद करते हैं। 

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:किताब-कॉपी बेच गाड़े सफलता के झंडे