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शहर में नकली घी का कारोबार जोरों पर

घी में चर्बी और पशुओं की हड्डी को गलाकर मिलावट की बात अब आम हो गई है। आगरा में नकली घी बनाने वाली कंपनी के पकड़े जाने के बाद से शहर के उपभोक्ता व्यापारी चिंतित हो उठे हैं। कालोनियों और दूर-दराज के इलाकों में उत्तर प्रदेश, राजस्थान में निर्मित डालडा व देशी घी सप्लाई होता है।

ब्रांड के आधार पर उपभोक्ता भी खूब खरीद फरोख्त करते हैं।  एनसीआर में घी खपत की फरीदाबाद बड़ी मंडी है। यहां घी के करीब दस हजर टीन की खपत है। व्यापार मंडल कार्यालय के अनुमान के मुताबिक जिले में घी का करोबार करीब 20 करोड़ रुपये महीने का है।

नकली घी को लेकर स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी समय-समय पर छापे मारने की बात करते हैं। व्यापारी भी इसकी पहचान न होने की बात कह रहे हैं। मिलावट से इंकार नहीं करते।घी के थोक व्यापारी राकेश अग्रवाल भी मानते हैं कि शहर में नकली घी का कारोबार जोरों पर हो रहा है। उत्तर प्रदेश से घी आने की बात व्यापारी स्वीकार रहे हैं।

आगरा  नजदीक है। बहरहाल, कई इलाकों में प्रमुख कंपनियों के डिब्बों और टीन में नकली सस्ता घी भरकर बेचा जाता है। इसकी अधिकतर खपत पिछड़े और ग्रामीण इलाकों में है। जहां स्वास्थ्य विभाग नमूने भरने की जहमत नहीं उठाते हैं। जब तक शिकायत नहीं की जए तो कोई फूड इंस्पेक्टर किसी की दुकान पर नहीं जाता है।

अग्रवाल के मुताबिक नकली घी मार्केट में सस्ता बिकता है। जैसे अभी ब्रांडेट घी के टीन की कीमत 725 रुपये है तो नकली घी का टीन 600 रुपये में बिक रहा है। फूड इंस्पेक्टर डीके शर्मा का कहना है कि विभाग के पास पर्याप्त साधन नहीं है। लेकिन इसके बावजूद अधिक से अधिक जांच का प्रयास रहता है। इस महीने 21 सैंपल लिए है। जिसमें सात दूध और चार घी के हैं।अन्य हल्दी, मिर्च व आटा आदि के हैं।

जिन्हें चंडीगढ़ की प्रयोगशाला में जांच के लिए भेजा गया है। शर्मा ने बताया कि सैंपल फेल पाए जाने पर मिलावटी वस्तु को बनाने और बेचने वाले के खिलाफ मामला दर्ज किया जाता है। कोर्ट में ऐसे मामले 140 से अधिक चल रहे हैं। लेकिन शहर में अभी तक दूध में यूरिया या घी में चर्बी हड्डी जैसी घातक चीजे नहीं पाई गई हैं। 

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