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कॉलेज की दहलीज पर ऐसे बचें हीन-भावना से

अभिभावकों और युवाओं के जीवन में एक दौर आता है, जब अच्छे कॉलेज में एडमिशन का भूत सिर चढ़ कर बोलने लगता है। जब तक मन-मुताबिक कॉलेज में एडमिशन न मिल जए, वे लंबे तनाव, निराश और भागदौड़ में फंसे रहते हैं। मन में लगातार यह विचार उठते रहते हैं कि यदि अच्छे कॉलेज में एडमिशन नहीं मिला तो क्या होगा? उस दौर में वे यह सोच-सोचकर दिन-रात परेशान रहते हैं। दोस्तों से लेकर रिश्तेदारों के विचार सुनकर वह उलझन में पड़े रहते हैं। इस चक्कर में लगातार दबाव में रहने के कारण वे न चाहते हुए भी हीनभावना के शिकार हो जते हैं और अंतत: उनका आत्मविश्वास डगमगाने लगता है।

यह बेहद जरूरी है कि आपका बच्च मानसिक व शारीरिक रूप से स्वस्थ रहे। एडमिशन को जिंदगी में आगे बढ़ने का एक कदम मानकर सही दृष्टि के साथ तैयारी करें। इसे जिंदगी की हार-जीत का फैसला न बनाएं। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि एडमिशन को हल्के ढंग से लिया जए। कॉलेज में एडमिशन युवा जीवन का अहम् हिस्सा है और इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एक स्वस्थ वातावरण व सही दृष्टिकोण जरूरी है। इसके लिए पेरेंट्स व स्वयं युवाओं को भी कुछ खास बातों का ध्यान रखना चाहिए।

आज के समय में न तो अच्छा कॉलेज चुनना आसान काम है और न ही उसमें एडमिशन पाना। ऐसे में जरूरत है कि बच्चे को बड़े कॉलेज में पढ़ाने का सपना न दिखाएं क्योंकि अधिकांश अभिभावक पहले से ही बड़े नामी कॉलेजों में पढ़ने का सपना सजने लगते हैं। ऐसे भी जब वह एडमिशन हासिल नहीं कर पाता तो उसके अहम् पर चोट लगती है।

अगर आप में कुछ कर गुजरने का जज्बा है तो किसी भी क्ष्‍ोत्र में आपको सफलता मिल सकती है। मनचाहे कोर्स में दाखिल न मिले तो उसके विकल्प तलाशें। अध्ययन की कोई धारा दूसरी से कम नहीं होती।

पेरेंट्स को चाहिए कि वे विषय को लेकर आपस में कहासुनी या तर्क-वितर्क न करें। बच्चे की प्राकृतिक रुचि को ध्यान में रखें, साथ यह भी पता कर लें कि कौन सा कोर्स बच्चे के भविष्य के लिहाज से बेहतर रहेगा।

अभिभावक घर लौटते ही माहौल भारी न करें। बार-बार जिक्र न करें कि किस कॉलेज में एडमिशन होगा, कैसे होगा आदि। ऐसे में बच्च आपसे कतराने लगेगा।

पेरेंट्स और बच्चे हर वक्त एडमिशन की बात न करें। इसका गहरा भावनात्मक प्रभाव पड़ता है। बच्चे में दिन-रात एडमिशन का हौवा घर करने लगता है।

हल्का-फुलका हंसी-मजक माहौल को तनावमुक्त रखता है। किसी भी स्थिति में बच्चों से संवाद रुकना नहीं चाहिए। उनके साथ खुलकर विचार-विमर्श करें और मुद्दे का सहज हल तलाशें।

यदि प्रतियोगिता जबर्दस्त है तो एवेन्यूज यानी प्रगति के द्वार भी अनेक हैं। अतः हताश होने के बजय तसल्ली और उत्साह के साथ नया रास्ता खोजें।

अभिभावक घर का माहौल सामान्य रखें। यदि बच्चे को तनाव की स्थिति महसूस होती है जसे सब चुपचाप अपना काम करते हैं, एकदम शांत रहता है तो समझ जएं कि बच्च स्ट्रेन से गुजर रहा है।

तनाव के रहते कभी सही दिशा व स्वस्थ दृष्टिकोण विकसित नहीं होगा, बल्कि वह कार्यक्षमता व आत्मविश्वास को प्रभावित करेगा ही। बेहतर होगा कि माहौल तनावपूर्ण न बनने दें।

अक्सर बच्चों में एडमिशन को लेकर पेरेंटल प्रेशर के साथ दोस्तों व सहपाठियों से प्रतिस्पर्धा का प्रेशर रहता है। ऐसे दबाव से छुटकारे के लिए जरूरी है कि घर में एडमिशन को लेकर माहौल बोझिल न करें। साथ ही ऐसे दोस्तों से भी दूर रहने की कोशिश करें जो आपका मनोबल तोड़ें। युवा अपने किसी मित्र, सहपाठी या रिश्तेदार से बराबरी की कोशिश न करें।

सफलता हर कोई चाहता है पर कई बार कामयाबी नहीं मिलती। दरअसल, यह एक सापेक्ष क्रिया है। एडिसन ने हजारों प्रयोगों के बाद सफलता प्राप्त की थी। अतः खुद पर विश्वास रखना चाहिए। इसलिए मन की दृढ़ता या आत्मविश्वास है। बच्चे याद रखें कि जितनी अधिक प्रेरणा होगी उतनी ही अधिक सफलता की संभावना भी बनी रहेगी।

कुछ युवा पर्सनेलिटी डिसॉर्डर के शिकार होते हैं जिनके कारण वह पसोपेश में रहते हैं और फैसला कर पाने में अक्षम रहते हैं। ऐसे डिसॉर्डर के शिकार युवा हमेशा दूसरों पर निर्भर रहते हैं। अपने दोस्तों से अलग होने का भय उन्हें हमेशा सताता रहता है, इसलिए वह हमेशा दूसरों के पीछे चलने में समय नष्ट करते हैं। दरअसल, किशोरावस्था के समय इस तरह की समस्या अपने शिखर पर होती है और व्यक्तिगत विकास में बाधा के रूप में सामने आती है। ऐसे में जरूरी है कि किसी काउंसलर की मदद से किशोर को अपनी क्षमताओं को पहचानना सिखाएं।

यदि पेरेंट्स आपकी कमजोरियों का जिक्र करते हैं जैसे काश थोड़े नंबर और आ जाते तो फलां कॉलेज में दाखिला मिल जता, ऐसे चक्कर तो नहीं काटना पड़ता। इस तरह की फिजूल बातों को भी हमेशा पॉजीटिव रूप में ही लें और अतीत को भूलकर आगे बढ़ने का प्रयास करें। आप स्वयं अपना आकलन करें हो सकता है आप में वास्तव में वह कमजोरी हो। ऐसी कोई भी कमजोरी नहीं जिसे दूर नहीं किया ज सकता। जरूरत है तो बस इच्छाशक्ति की।

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