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ऑटिज्म

ऑटिज्म बच्चों के विकास को बाधित करता है। इससे बच्चों के न्यूरोसिस्टम पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। ऑटिज्म से पीड़ित बच्चे समाज में घुल-मिल नहीं पाते, साथ ही उनका कम्युनिकेशन भी कमजोर होता है। गौर करने वाली बात यह है कि ऑटिज्म से पीड़ित दो बच्चों के लक्षण समान नहीं होते। जहां कुछ बच्चों में यह बीमारी सामान्य रूप में होती है, तो कुछ में इसका प्रभाव कुछ ज्यादा ही देखने को मिलता है। जब बच्च बोलने की अवस्था में आता है, अगर उम्र के अनुसार कहा जए, तो जब बच्चे की उम्र दो से तीन वर्ष की होती है, तो सामान्यतः बच्चे में ऐसी दिक्कतें देखने को मिलती हैं। इस बीमारी से ग्रसित बच्चे कई चीजों जैसे - प्रकाश, ध्वनि, महक, तापमान, दर्द, स्वाद आदि के प्रति काफी संवेदनशील होते हैं। उदाहरण के तौर पर वह प्रकाश में अपनी आंखों को बंद कर लेते हैं, कुछ विशेष ध्वनियों के सुनाई पड़ने पर वह अपने कानों को बंद कर लेते हैं।

ऑटिज्म से पीड़ित बच्चे अलग तरीके के खेल खेलते हैं, जैसे कई कारों को क्रमबद्ध करने का खेल। ऐसे बच्चे समूह में रहना पसंद नहीं करते, उनकी अपनी अलग ही दुनिया होती है। वह बिना किसी बात के रोने और चिल्लाने लगते हैं। इस तरह के बच्चे अपने गुस्से, हताशा आदि का इजहार बोल कर नहीं करते हैं। खून की जांच और एक्सरे द्वारा ऑटिज्म को पहचाना नहीं जा सकता। यह माता-पिता पर ही निर्भर करता है कि इसके शुरुआती लक्षणों के आधार पर इसकी पहचान करें।

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