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भारत के लिए जरूरी है ब्रिक

ब्राजील, रूस, भारत और चीन (ब्रिक) देश समूह और शंघाई सहयोग संस्था (एससीओ) के शिखर सम्मेलन रूसी शहर येकेतेरीनबर्ग में पूरी तैयारियों के साथ आयोजित किए गए। भारत ब्रिक का एक अभिन्न सदस्य है, जबकि एससीओ का यह एक पर्यवेक्षक सदस्य है। भारत के प्रधानमंत्री दोनों शिखर सम्मेलनों में शामिल हुए।

अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षरों के बने इन विचित्र सम्मेलनों का क्या तात्पर्य है, जिनकी वजह से रूस का एक प्राचीन शहर फिर से चर्चा में आ गया। ब्रिक और एससीओ में से किसी को एक क्षेत्रीय आर्थिक समुदाय (रीजनल ग्रुपिंग) नहीं माना ज सकता। क्योंकि, इनका उद्देश्य एक मुक्त व्यापार व्यवस्था करना या आर्थिक संघ का निर्माण करना नहीं है। और न इन्हें नाटो या दिवंगत वारसा पैक्ट जसे सुरक्षा या राजनैतिक गठबंधन की श्रेणी में ही गिना ज सकता है। ये दोनों संस्थाएं शीत युद्ध की समाप्ति के बाद स्थापित की गईं। और इनका मुख्य उद्देश्य है: विश्व व्यवस्था को अमेरिका के एक ध्रुवीय आधिपत्य के अंदर नहीं आने देना। किसी भी नई व्यवस्था में रूस, चीन, भारत, ब्राजील जसे देशों के योगदान की संभावना बनाए रखना। अंतरराष्ट्रीय कानून व्यवस्था को बनाए रखना। अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को स्थायित्व प्रदान करना।

विश्वव्यापी महामारी, प्राकृतिक आपदा एवं आतंकवाद जसी समस्याओं के समाधान में योगदान देना। यही कारण है कि एससीओ के तत्वावधान में संयुक्त सैनिक कवायद किए जते हैं और ब्रिक में विश्वव्यापी आर्थिक मंदी से उबरने, सुरक्षा परिषद् की सदस्यता बढ़ाने एवं अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था को पुनर्गठित करने के मामलों पर वार्तालाप करना है। एससीओ के अंतर्गत आर्थिक और ऊज्र सहयोग की अपार संभावनाएं हैं। इसीलिए इनके बारे में अगले शिखर सम्मेलन में वार्ता होगी। परंतु ब्रिक के अंतर्गत बहुपक्षीय आर्थिक सहयोग की संभावना कम है। इसलिए इसे एक राजनैतिक मंच समझना ही उचित होगा। हर सूरत में इन दोनों मंचों में से किसी को भी एक अमेरिका विरोधी गठबंधन समझना भ्रामक होगा। क्योंकि इन राष्ट्र समूहों में प्रत्येक का अमेरिका के साथ का संबंध उनके पारस्परिक संबंधों से वृहत्तर और अधिक महत्वपूर्ण है। इनके संयुक्त सैनिक कवायद अमेरिका के खिलाफ नहीं किए जते हैं। इनका एकमात्र उद्देश्य है, एक दूसरे से सीखना और विश्वव्यापी समस्याओं से जूझने के लिए पारस्परिक सहयोग का एक मोर्चा खड़ा करना।

भारत के लिए इन संस्थाओं का महत्व विशेषकर राजनैतिक और रणनैतिक है। यद्यपि एससीओ के अंतर्गत आर्थिक सहयोग हो सकते हैं। उदाहरण स्वरूप ईरान और मध्य एशियाई राष्ट्र हमारी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित कराने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। चीन और रूस के साथ हमारे बहुआयामी सहयोग के संबंध हैं। ये संबंध मुख्यतः द्विपक्षीय हैं। एससीओ और ब्रिक के शिखर सम्मेलन में होने वाले उच्च स्तरीय विचार-विमर्श एवं सामूहिक कार्रवाइयों के द्वारा इन द्विपक्षीय संबंधों को सुदृढ़ बनाया जा सकता है। कुछ क्षेत्रीय और विश्वव्यापी मामलों में इन देशों का बहुपक्षीय सहयोग अत्यधिक उपयोगी हो सकता है। जसे, वर्ममान विश्वव्यापी आर्थिक मंदी के संदर्भ में अगर भारत, चीन, ब्राजील और रूस जसे राष्ट्र अपने बाजरों को खुला रखें तो इस मंदी से निबटने में काफी मदद मिल सकती है। उसी प्रकार अफगानिस्तान से अमेरिका के बाहर हो जाने के बाद, भारत को इस देश में अपने हितों की रक्षा करने के लिए, रूस, ईरान एवं मध्य एशियाई देशों के सहयोग की आवश्यकता होगी। अतः इन दोनों संगठनों के शिखर सम्मेलनों में भारत के प्रधानमंत्री का शामिल होना आवश्यक है।

एससीओ के पिछले शिखर सम्मेलन में भारत ने हिस्सा नहीं लिया था। साथ ही साथ, उस अवसर पर एससीओ से संबद्ध राष्ट्रों ने जो संयुक्त सैनिक कवायद की थी, उसमें भी भारत सम्मिलित नहीं हुआ था। परंतु ठीक उसके पहले, अमेरिका, जपान, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर आदि देशों के संयुक्त सैनिक कवायद में भारत ने हिस्सा लिया था। इसके चलते उस समय भारत की विदेश नीति के संबंध में अनेक आशंकाएं पैदा हुई थीं। इसकी सफाई में भारत के प्रवक्ता ने जो दलीलें पेश की थीं, वे बड़ी लचर थीं। यह कहा गया था कि एससीओ में भारत की दिलचस्पी केवल आर्थिक सहयोग में है, राजनैतिक और सैनिक सहयोग में नहीं- मानों कि पारस्परिक सहयोग के इन दो पक्षों के बीच इस प्रकार की लक्ष्मण रेखा खींची ज सकती है। भारत की ओर से यह भी कहा गया था कि पिछले शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री की गैरहाजिरी का यह भी कारण था कि पर्यवेक्षक सदस्य की हैसियत से भारत के प्रधानमंत्री को शिखर सम्मेलन में प्रत्यक्ष योगदान करने की गुंजइश नहीं थी, और उन्हें बाहर बैठकखाने में समय बर्बाद करना नागवार था। अगर ऐसी बात थी तो फिर ईरान और पाकिस्तान जसे पर्यवेक्षक सदस्यों के राष्ट्रपतियों ने इस शिखर सम्मेलन में क्यों हिस्सा लिया था? यदि उन्होंने यह राजनैतिक उद्देश्य से किया था तो क्या भारत को भी ऐसा करना लाजिमी नहीं था?

हकीकत तो यह है कि उस समय भारत सरकार ने नीति के स्तर पर यह निर्णय ले लिया था कि विश्व राजनैतिक व्यवस्था में भारत अमेरिका के साथ कदम मिलाकर चलेगा। अमेरिका को जो पसंद नहीं है, उसे भारत नहीं करेगा। भारत की धारणा थी कि उस समय का अमेरिकी प्रशासन नहीं चाहता था कि भारत एससीओ के बहुत करीब आए। इसलिए भारत ने जनबूझकर एससीओ से दूरी बनाकर  रखी। इस नीति के चलते रूस के साथ के हमारे संबंधों में तल्खी पैदा हो गई। इसकी अभिव्यक्ति भारत के प्रधानमंत्री की पिछली रूस यात्रा के समय हुई। तत्कालीन रूसी राष्ट्रपति पुतिन, प्रतिनिधिमंडल के स्तर पर भारतीय प्रधानमंत्री के साथ वार्तालाप करने के लिए राजी नहीं हुए। उन्होंने कहा कि इस स्तर पर वार्तालाप केवल रूस के प्रधानमंत्री के साथ होना चाहिए। भारत और रूस के पारस्परिक संबंधों के इतिहास में ऐसी घटना पहली बार हुई।

एससीओ के वर्तमान शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री के स्तर पर हिस्सा लेने का फैसला कर भारत ने अपनी विदेश नीति में आए असंतुलन को दूर करने की दिशा में एक अच्छा कदम उठाया है। भारत जसे देश की विदेश नीति किसी एक राष्ट्र चाहे वह अत्यधिक शक्तिशाली क्यों न हो, की ओर झुकी नहीं रह सकती। हमारी भौगोलिक और रणनैतिक स्थिति ऐसी है कि हमें दुनिया की सारी शक्तियों के साथ क्रियात्मक और कारगर संबंध बनाए रखने होंगे। हमारे देश की जनता में भी आम मत है कि अमेरिका के साथ रणनैतिक संबंध बनाए रखने के साथ-साथ हमें अन्य महत्वपूर्ण राष्ट्रों के साथ के अपने संबंधों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। विदेश नीति चलाने में भारत को पूर्ण स्वायत्तता कायम रखनी चाहिए और सभी महत्वपूर्ण विकल्प खुले रखने चाहिए।

लेखक भारत के विदेश सचिव रह चुके हैं

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