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ब्रिटेन : सम्मान से मरना भी नसीब नहीं

तालिबानीकरण और ऐसी तमाम समस्याओं के बावजूद लाहौर में रहने वाले गिने-चुने हिंदुओं और सिखों के लिए एक राहत की बात है कि शहर के बंड रोड पर एक श्मशान हैं जहां वे खुले आसमान के नीचे अपने समुदाय के मृतकों का दाह संस्कार कर सकते हैं। चार साल पहले इसे पंजब सरकार ने बनवाया था और पाकिस्तान ऐसी सुविधा देने वाला पहला इस्लामिक देश है। हालांकि इसके एक साल बाद अफगानिस्तान की सरकार ने भी मानवाधिकार के नाम पर अपने देश के अल्पसंख्यकों को यह सुविधा दे दी।

लेकिन बराबरी, निजी आजदी और मानवाधिकारों की बात करने वाले ब्रिटेन में हिंदुओं और सिखों को यह अधिकार अभी तक नहीं मिला। वहां गैस बर्नर शवदाह केंद्र जरूर है, जिसमें एक साथ तीन शवों का दाह किया ज सकता है।

यह भी कहा जता है कि जब पर्याप्त मानव शव नहीं होते तो वे पालतू जानवरों का शवदाह भी उसी जगह करते हैं। फिर सभी शवों की अस्थियां मिल जती हैं, परिवार के लोग जब वहां आते हैं तो किसी को पता नहीं होता कि जो अस्थियां वे ले ज रहे हैं वे किसकी हैं?

एंग्लो एशियन फ्रेंडशिप सोसायटी के देवेंद्र कुमार घई चाहते हैं कि हिंदुओं और सिखों को खुली जगह में मृतकों के शवदाह का अधिकार मिले। इसके लिए वे लंबे समय से ब्रिटिश अधिकारियों से उलङो हुए हैं। जब वे ‘सम्मानजनक मौत’ की बात करते हैं तो उनकी आवाज में ब्रिटेन में रहने वाले हजरों हिंदुओं और सिखों की भावना होती है। मार्च 2007 में उनकी कोशिश तब रंग लाई, जब उन्होंने एक अदालत को सार्वजनिक हित के इस मामले में हुए रॉयल कोर्ट ऑफ जस्टिस लंदन के एक पुराने फैसले की समीक्षा के लिए राजी कर लिया।

मीडिया में जिस तरह से इस मामले का कवरेज हुआ, उससे भारतीय समुदाय को काफी बल मिला। ब्रिटेन के सभी बड़े मीडिया प्रतिष्ठानों ने इस मामले को धार्मिक स्वतंत्रता और ब्रिटिश लीगल इतिहास के लिहाज से बड़ी घटना माना।

हालांकि पहली अपील में घई हार गए, लेकिन उन्हें आगे अपील करने की इजजत जरूर मिल गई। अब यह मामला संभवत: हाउस ऑफ लार्ड्स में उठाया जएगा। इसके पहले फैसले में अदालत ने यही कहा कि खुली जगह में मानव शरीर को जलाना कानूनन अपराध है।

घई की उम्र 71 साल की हो चुकी है, अपनी बीमारी के बावजूद भी वे जुटे हुए हैं। शुरूआत तब हुई जब वे पैसा जमा करके न्यूकैसल की एक निजर्न जगह पर शमशान बनाना चाहते थे। स्थानीय अधिकारियों ने इजजत नहीं दी।
हालांकि वे इसके लिए किसी कानून को बदलने की मांग नहीं कर रहे बल्कि बराबरी का अधिकार मांग रहे हैं। क्योंकि ब्रिटेन में रहने वाले यहूदियों और मुसलमानों को अलग कब्रगाह के लिए जगह दी गई है।

जक स्ट्रा की अगुवाई वाला ब्रिटिश न्याय विभाग घई की अपील का शुरू से ही विरोध कर रहा है। उसका कहना है कि खुली जगह पर शवदाह का मामला परंपरा का मामला है, आस्था का नहीं। इसलिए इसे धार्मिक अधिकार मानकर इसकी रक्षा नहीं की ज सकती।

स्ट्रा ने जन स्वास्थ्य और जन सुरक्षा का तर्क देते हुए इसका विरोध किया है। घई के वकील का तर्क है कि ब्रिटिश सरकार इस तरह के शवदाह की वधानिकता को 1894 से ही स्वीकार कर रही है।

ब्रिटिश सरकार ने पहले विश्व युद्ध के दौरान इंडियन ब्रिटिश सेना के मरने वाले जवानों के दाह संस्कार की इजजत दी थी। और 1934 में नेपाल के शाही परिवार के एक सदस्य के निधन पर भी यही हुआ था। यहां तक कि खुद घई ने भी नार्दअंबरलैंड में राजपाल मेहता का दाह संस्कार खुले में ही किया था और उन्हें इसके लिए कोई सज नहीं हुई।

वादी का कहना है कि कनवेयर बैल्ट के जरिये होने वाले शवदाह को ब्रिटेन में रहने वाले भारतीय पसंद नहीं करते हैं क्योंकि यह उनकी आस्थाओं के विपरीत जता है।

पूरे ब्रिटेन में इस तरह के 200 शवदाह केंद्र हैं लेकिन लोग खुले में ही दाह संस्कार की इजजत चाहते हैं। अगर लोगों को ग्रामीण और निजर्न स्थान पर इसकी इजजत दी जती है तो भारतीय किसी दूसरे समुदाय की भावनाओं को आहत किए बिना यह काम कर सकेंगे। यह भी तर्क दिया गया है कि इससे शोक संतप्त परिवारों का खर्च भी बचेगा। गैस बर्नर पर शवदाह में दो हजर पौंड का खर्च आता है जबकि दाह संस्कार अगर खुले में होता है तो 500 पौंड का खर्च ही होगा।

घई और उनके वकीलों का कहना है कि दाह संस्कार की इजजत आस्ट्रेलिया और अमेरिका सहित दुनिया के कई देशों में है। इनमें 12 ऐसे कट्टर विचारधारा वाले देश भी हैं जो दाह संस्कार को गलत मानते हैं।

लेखिका हिन्दुस्तान टाइम्स में डिप्टी फॉरेन एडीटर हैं

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