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मन की शांति

संसार में अनेक प्रकार के धन हैं, नाना प्रकार की शक्तियां और चेतनाएं हैं पर सबसे बड़ी विभूति है मन की शांति। जो भीतर की शांति जसी अमृतदायिनी शक्ति का रसास्वादन करता है। बाहर के क्षण-क्षण उत्पन्न होते, प्रलोभन, कोलाहल से विचलित नहीं होता वही मनुष्य स्थित प्रज्ञ है। आंतरिक शांति का तात्पर्य यह है कि आपकी शरीर रूपी मशीन को, अपना कार्य स्वाभाविक रूप से करने का अवसर प्रापत हो रहा है, इसमें कोई अनुचित दबाव या खिंचाव नहीं। कोई भी विकार-भय, चिंता, वासना उत्तेजना घृणा ईष्र्या जब मन में जटिलता से प्रवेश कर जता है, तब वही स्थिति होती है, जो मशीन में गंदगी, कंकड़, पत्थर या लोहे का कोई टुकड़ा यकायक अटक जने से होता है। मशीन की स्वाभाविक गति अस्त व्यस्त हो जती है या बंद हो जती है। जितनी देर मन का विक्षोभ हमारे ऊपर सवार रहता है, हम क्या से क्या हो जते हैं। शरीर पर विचार तथा दृढ़ संकल्प का तीव्र प्रभाव होता है। यदि हम शांत रहने का संकल्प कर लें तो यह हमारी प्रकृति की आदत बन सकता है। मनोविज्ञान का यह नियम है कि हम अपने कायो्रं द्वारा जसा अभिनय करते वसा ही भाव अंदर अनुभव भी करते हैं। कभी-कभी दूसरों को दिखाने के लिए आनन्द उल्लास प्रसन्नता का अभिनय करते हैं, हंसते हैं, खिलखिलाते हैं तो मन में उस आनन्द की अनुभूति प्राप्त करते हैं। जसा बा स्वरूप वसी मन:स्थिति का निर्माण, यही सिद्धांत है।

ईसा ने कहा- अपने शत्रुओं को क्षमा करो उसने प्रेम करो। ईसा तत्कालीन नीति की ही बात नहीं कर रहे थे, वरन मानसिक शांति का उपाय बता रहे थे, उन्होंने कहा था सौ से निन्यानबे बार क्षमा कीजिए। वे हृदय रोगों व अनेक रोगों से बचने का उपाय बता रहे थे।मेरे पास सब कुछ है, यह भावना मन में रख कर काम करें। मुङो किसी की कृपा प्रोत्साहन, कृतज्ञता की आवश्यकता नहीं, मेरी आत्मप्रेरणा ही सब कुछ है। यही विश्वास आंतरिक सुख है, ‘मन की शांति’ है।

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