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कैसे कहें कि आप गलत कर रहे हैं

ऑस्ट्रेलिया में छात्रों पर नस्ली हिंसा पर महाराष्ट्र की बिहारी और यूपी के छात्रों के साथ प्रांतीय हिंसा की याद आ गई। हम खुद ऐसे घृणित कार्य में संलग्न रहते हैं तो भला विदेशियों से क्या आशा रखें। आज दूरसंचार की क्रांति में पल-पल की खबर विश्व को मिल जाती है। यदि हमारे देश के प्रतिनिधियों से सवाल-जवाब करें कि महाराष्ट्र उत्पीड़न क्यों हुआ उसके लिए हमने क्या किया तो जवाब हमारी खामोशी होगी। कभी हम सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री पद के लिए विरोध करते हैं तो कभी प्रांतीय व्यक्तियों की आवाजाही पर ऐतराज करते हैं तो हम कैसे उन विदेशियों को कहें कि आप जो कर रहे हैं गलत कर रहे हैं? पहले हमें ऐसे महाघृणित कार्य करने वाले पर लगाम लगानी होगी तभी हम विश्व समुदाय की आंखों में आंखें डाल कर बात कर सकते हें।

अमित बजरंग,  नई दिल्ली

वह दिन दूर नहीं जब..

पाकिस्तान ने मुंबई हमले के मास्टर माइंड हाफिज सईद को रिहा कर देने पर भारत और अमेरिका ने चिंता व्यक्त की। लगता है कि पाक फिर अपनी ही गर्त में डूबता चला जा रहा है। वहां आज भी आतंकवादी खुलेआम घूम रहे हैं, जिससे भारत ही नहीं पूरे विश्व को खतरा है। दुर्भाग्य से इस बात का अफसोस भी है कि पूरी दुनिया  इस सच्चई को अब तक सच्चे मन से स्वीकार नहीं कर रही है। बारूद के ढेर पर बैठा पाक शायद यह भूल गया कि आतंकवादी किसी के अपने नहीं होते। अगर ऐसा ही रहा तो वह दिन दूर नहीं जब पाक को दुनिया का कैंसर कहा जाने लगे।

शुशांक कुमार, अशोक नगर, नई दिल्ली

जरा खुद भी सोचिए

रेलवे ने विज्ञापन के जरिए यात्रियों को रेल डिब्बे के बाहर लटक कर यात्रा न करने को आगाह किया है। पर क्या यात्री इसे शौक समझते हैं या मजबूरी? क्या रेलवे ने इनके कारणों का कारण जाना है जबकि कारण जरूरत से ज्यादा स्पष्ट है। बिहार की गाड़ियों को छोड़कर, बाकी ज्यादातर ट्रेनों में साधारण कोच दो ही होते हैं, जबकि 24 डिब्बों वाली ट्रेन में एसी कोच 6 होते हैं। क्यों नहीं रेलवे फीड बैक स्टेशनों पर भीड़ और टिकट बिक्री का संज्ञान लेती है।  सिर्फ विज्ञापन निकाल देने भर से रेलवे क्यों अपना पल्ला झड़ लेना चाहती है?

हरिओम मित्तल, गुड़गांव

मीठा गप्प, कड़वा थू

‘महिला बिल पर भड़के मुलायम’। बहुत आश्चर्य हुआ कि उन्हें डर है कि अब अधिकतर पुरुष एमएलए और एमपी दुबारा नहीं चुने जएंगे। उनके मुताबिक 55 प्रतिशत सीटें महिलाओं को चली जएंगी। आरक्षण का इतना विरोध। जब मंडल आरक्षण आया था तो कई सवर्णो/अगड़ी जति के विद्यार्थियों ने विरोध में आत्महत्या कर ली थी। तब तो कोई कमी नहीं की गई थी। आज नौकरियों में लगभग 80 प्रतिशत तक आरक्षण है। कभी इनकी पीड़ा महिला आरक्षण बिल के विरोधियों को महसूस हुई। जब खुद पर आती है तो मुलायम सिंह जसे नेता इसी तरह शोर मचाते हैं। मीठा मीठा गप्प, कड़वा कड़वा थू।

उमेश, द्वारका-10, नई दिल्ली

अलविदा तनवीर

वो लेखक/कलाकार खुशनसीब होते हैं जो जीते-जी लोकप्रियता बटोरते हैं वरना इस दुनिया में लेखक को मरने के बाद ही सम्मान मिलता है। हबीब तनवीर जी कला मंच के पुजरी थे, उनकी मेहनत ने उन्हें देश-दुनिया में बतौर रंगकर्मी प्रसिद्धि दिलाई। मैं  समस्त लेखक/कलाकार जगत की ओर से उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।

श्रीचरन, दक्षिणपुरी, नई दिल्ली

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