class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

इतिहास का बोझ

अगर कांग्रेस ने राजसी उपाधियों से निजात पाने का जो फैसला किया है उसे पार्टी में राजघरानों के लोग लागू करके देखें, उन्हें काफी हल्का महसूस होगा। लोकतंत्र की आबोहवा में भारी भरकम राजसी परिधान यूं भी बोझ ही बन जते हैं। भारत के कई इलाकों में अभी तक जनता में सामंती वफादारी कुछ हद तक बाकी है और राजनेता बने पूर्व रजवाड़े उसका फायदा उठाते हैं लेकिन इक्कीसवीं शताब्दी के भारत में इस राजसी अंदाज को पर्यटकों को लुभाने के लिए हैरिटेज होटलों और ‘पैलेस ऑन व्हील्स’ और संग्रहालयों तक ही रहना चाहिए, रोजमर्रा के कामकाज में यह सब अड़चन ही बनता है। भारत का लोकतंत्र कई विरोधाभासों का पुलिंदा है वसे ही कांग्रेस पार्टी भी है। कांग्रेस बुनियादी तौर पर भारत को आधुनिक लोकतंत्र बनाने वाला संगठन है लेकिन एक सामंती धरोहर यानी परिवार की हुकूमत कांग्रेस में महत्वपूर्ण है। यह भी एक विरोधाभास है कि उन्हीं इंदिरा गांधी ने ही राजाओं के प्रीवीपर्स खत्म किए थे जिन्होंने पारिवारिक वफादारी को एक बड़ा राजनैतिक मूल्य बनाया। ऐसा ही विरोधाभास यह है कि राहुल गांधी पार्टी संगठन को सचमुच जनोन्मुख और लोकतांत्रिक बनाने की कोशिश कर रहे हैं और यह फैसला भी उसी अर्थ में देखना होगा। यह ध्यान देने की बात है कि यह फैसला सबसे पहले राजस्थान से आया जहां पिछली राज्य सरकार ने दरबारी संस्कृति को कुछ ज्यादा ही महत्व दिया था। इस मायने में यह बात भी अजीब है कि भारतीय जनता पार्टी अपने ढांचे में पर्याप्त आधुनिक लोकतांत्रिक पार्टी है लेकिन राजसी प्रतीकों आदि का वहां बड़ा सम्मान है। यह फैसला अच्छा है लेकिन सामंती संस्कारों को जने में लंबा वक्त लगेगा। राज कहलाना या वसा ताम-झम रखना काफी आकर्षित करने वाली बातें हैं इसलिए हमारे लोकतंत्र में कई ऐसे नेता हैं जो राजपरिवारों से नहीं हैं लेकिन सत्ता पाने के बाद उन्होंने ऐसा ताम-झाम बना लिया है जसा मध्ययुग में होता था। वीवीआईपी या वीआईपी होना, लंबा चौड़ा सुरक्षा तंत्र, आराम और ऐश्वर्य के तमाम साधन जुटाना वसा ही है जसे महाराज, कुंवर या नवाब साहब होना। अच्छी बात यही है कि जनता अब जागरूक हो रही है और अक्सर चुनावों में पुराने या नए रजवाड़ों को जमीन पर ला देती है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:इतिहास का बोझ