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वुमन इन आईटी

वुमन इन आईटी

ब्रिटेन में सौ कंपनियों पर किए गए एक सर्वे में पाया गया कि जिन कंपनियों के बोर्ड में महिलाएं शामिल थीं, उनके इक्विटी रिटर्न का औसत 13.8 प्रतिशत था, जबकि इसकी तुलना में जिन कंपनियों के बोर्ड में केवल पुरुष ही थे, उनका औसत इक्विटी  रिटर्न 9.8 प्रतिशत था। यानी घर की धुरी कहलाने वाली स्त्री जिसे अब तक पुरुषों के वर्चस्व वाले कार्यक्षेत्रों के लिए अयोग्य समझा जाता था, उसने इन क्षेत्रों में भी अपनी सशक्त भागीदारी साबित की है और अब केवल शिक्षण, चिकित्सा या ऐसे ही कुछ गिने-चुने क्षेत्रों में ही स्त्रियां अपनी भागीदारी नहीं दे रहीं, बल्कि इन क्षेत्रों की परिधि से बाहर निकल कर पुरुष प्रधान समझे जाने वाले आई.टी सेक्टर में भी अपनी योग्यता साबित कर रही हैं। इसी बदलते परिदृश्य का प्रमाण है कि पिछले वर्ष जहां आई.टी और बी.पी.ओ. इंडस्ट्री में कुल मिलाकर 28 प्रतिशत महिलाएं कार्यरत थीं, वहीं इस वर्ष इनकी संख्या बढम्कर 33 प्रतिशत हो चुकी है।

आई.टी. और बी.पी.ओ. क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी को कंपनी की बेहतरी और बढोतरी के लिए अब एक सूक्ष्म कारक माना जाने लगा है और कंपनियां यह मानने लगी हैं कि महिलाओं का इस क्षेत्र से जुड़ना ही नहीं, इसमें लंबे समय तक टिके रहना भी अच्छे बिजनेस के लिए बेहद जरूरी है। अपनी खास शख्सियत, प्रोत्साहित करने के गुण, रिस्क लेने की क्षमता  और काम को हर हालत में बेहतर ढंग से करने की प्रबल इच्छाशक्ति के चलते महिलाएं आज के प्रतियोगी वातावरण के हिसाब से नेतृत्व करने की भी अद्भुत क्षमता रखती हैं। इसलिए अब जोर केवल महिलाओं को इन क्षेत्रों में आकर्षित करने पर ही नहीं है, बल्कि महिलाओं को यहां एक बेहतर और सहयोगी माहौल देने की हर संभव कोशिश में आज आई.टी. इंडस्ट्री जुटी है। आज बात केवल इन क्षेत्रों में महिला-पुरुषों की संख्या के संतुलन तक ही नहीं रह गई है, बल्कि आई.टी. कम्पनियां अपने संस्थानों के लिए योग्य महिलाओं की महत्ता को पहचान कर उन्हें हर संभव सहूलियत देने के लिए बढम्-चढम् कर योजनाएं बना रही हैं और सबसे अधिक गौरतलब बात यह है कि ये योजनाएं केवल कागजों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि प्रत्यक्ष तौर पर पुराने मिथकों और रूढिम्यों से निकल कर हर संभव महिलाओं के हित में योजनाएं बनाई और क्रियान्वित की जा रही हैं।

आई.टी. कंपनियां अब और अधिक महिलाओं को इन क्षेत्रों की ओर आकर्षित करने के लिए खास प्रोग्राम्स चला रही हैं, जिनमें युवा लडकियों को भी आई.टी. को एक सशक्त करियर के रूप में अपनाने के लिए प्रोत्साहित और मार्गदर्शित किया जा रहा है। जोर केवल महिलाओं को इन क्षेत्रों से जोड़ने पर ही नहीं है, बल्कि बने रहने पर भी है, क्योंकि पारिवारिक परिस्थितियों के चलते काफी महिलाओं को करियर के बीच में ही लम्बी छुट्टी लेनी पड़ती है, उनके सामने मातृत्व और पारिवारिक जिम्मेदारियों जैसे अहम पहलू जुड़े होते हैं। दोबारा नौकरी पर आने के बाद महिलाएं स्वयं को नए माहौल के अयोग्य महसूस करती हैं। महिलाओं की इस आम समस्या को भी दूर करने के लिए आज कई कंपनियां आगे बढ़कर नई योजनाएं ला रही हैं, जो काफी कारगर भी सिद्ध हो रही हैं। अवकाश के दौरान महिला कर्मचारियों को कंपनी से जोड़ने रखने, नए बदलावों से उन्हें रूबरू कराने और दोबारा ज्वाइन करना
पर उनके आत्मविश्वास और कार्यक्षमता को फिर से बढमने के लिए काउंसिलिंग और ट्रेनिंग सेशंस जैसी सुविधाएं आज कई नामी-गिरामी कंपनियां महिला कर्मचारियों को दे रही हैं। परिवार और काम-काज से जुड़ी समस्याओं को भी समान तवज्जो देते हुए काम के लिए ‘फ्लेक्सिबल टाइम’ या घर से काम करने जैसे उपायों पर भी कंपनियां गंभीरता से विचार कर रही हैं। आंकडम्े बताते हैं कि फ्रेशर्स के रूप में नौकरी शुरू करने वाली केवल एक तिहाई महिलाएं ही मध्यम या उच्च दर्जे पर पहुंच पाती हैं, क्योंकि इस पडमव तक पहुंचने के बीच ही उन्हें विवाह, बच्चे और अन्य पारिवारिक जिम्मेदारियों पर भी पूरी तरह अपना ध्यान और समय दोनों ही देने पड़ते हैं।

आज हर बड़ी कंपनी अपनी छवि एक ऐसी कंपनी के रूप में बनाना चाहती है, जो पुरुष और महिलाओं दोनों को ही हर तरह से समान अवसर और समान अधिकार देना चाहती है। यही कारण है कि आज महिलाओं का कार्यक्षेत्र में ओहदा भी सुधरा है और महिलाओं के लिए सुविधाजनक मानी जाने वाली मानव संसाधन और पब्लिक-रिलेशन डिपार्टमेंट्स में ही नहीं पुरुष प्रधान माने जाने वाले तकनीकी और मैनेजेरिल पोजिशंस में भी महिलाएं अपनी योग्यता बेहद प्रभावशाली ढंग से सिद्ध कर रही हैं।

महिलाओं को बेहतर ढंग से काम काज में स्थापित करने वाली कम्पनियों को प्रोत्साहित करते हुए नेशनल एसोसिएशन ऑफ सॉफ्टवेयर एण्ड सर्विस कंपनीज यानी ‘नैसकॉम’ भी ‘जेन्डर इन्क्लूसिविटी अवॉर्डस’ प्रदान करती है, जिसमें आई.टी. और बी.पी.ओ. उद्योग से जुड़ी उन कंपनियों को सम्मानित किया जाता है, जो प्रभावकारी योजनाएं लागू करती हैं, जिनसे बिना लिंग-भेद के समान अधिकार और महिलाओं को उनकी योग्यतानुसार पुरुषों के समान ही नेतृत्व के लिए भी अपेक्षित माहौल और अवसर मिले।

कहते हैं महिलाएं अगर कुछ ठान लें तो उसे पूरा करके ही रहती हैं और आई.टी. सेक्टर में महिलाओं की बढ़ती संख्या इस बात को बखूबी साबित करती है। लेकिन इस सबके बावजूद अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। चाहे बात उनकी सुरक्षा की हो या शोषण की, प्रयास काफी होकर भी अभी नाकाफी ही हैं।

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