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खेल में चोट

खिलाड़ियों की चोटों पर विशेषज्ञ राय रखने वाले सभी डॉक्टर एवं फिजियोथेरेपिस्ट मानते हैं कि कोई भी खिलाड़ी फिटनेस की कमी से अधिक चोटिल होता है। किसी भी खेल के लिए अनुकूलता की जरूरत होती है। वार्म अप और कंडीशनिंग से आप उस खेल के लिए तैयार होते हैं। यदि इसके बिना मैदान पर उतरते हैं तो चोटिल होने के अवसर अधिक होते हैं।

लक्ष्मीबाई नेशनल इंस्टीट्यूट आफ फिजिकल एजुकेशन, ग्वालियर में हैल्थ सर्विसेज एवं योग के हेड ऑफ द डिपार्टमेंट डॉ.पी.के.पांडेय मानते हैं कि क्रिकेटरों की चोटों का कारण अधिक क्रिकेट खेलना है। वह कहते हैं कि हमारे शरीर की अपनी सीमाएं हैं। आज क्रिकेट इतना अधिक हो गया है कि खिलाड़ियों को रेस्ट करने का समय ही नहीं है। वह फिटनेस कार्यक्रम की बजाए भी क्रिकेट खेलने में ही लगे रहते हैं। उन्हें विश्राम बहुत कम मिलता है। वह बहुत अधिक स्ट्रेन लेने लगे हैं। हर शरीर की अपनी सीमाएं होती हैं, कुछ इन परिस्थितियों को ङोल जाते हैं तो कुछ का शरीर जवाब देने लगता है और चोटिल हो जाता है।

वह कहते हैं - जो खिलाड़ी जितना अधिक फिट होगा, उसे चोट की संभावनाएं उतनी ही कम होंगी। फिट रहने के लिए किसी भी खेल में वार्म अप एक्सरसाइज, कूल डाउन एक्सरसाइज और उन विशेष परिस्थितियों के अनुकूल ढलने के लिए कंडीशनिंग एक्सरसाइज जरूरी होती हैं। इन सभी बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए पर जब आपके पास खेलने का बहुत अधिक व्यस्त कार्यक्रम होगा, तो भला कैसे ध्यान दिया जा सकता है।

डॉ. पांडेय बताते हैं कि चोटें तो कॉमन होती हैं। जैसे फ्रैक्चर, सूजन, घाव या खून बहना, मांसपेशी खिंचना, स्ट्रेन आदि। उनका इलाज भी एक जैसा होता है। पर चोट लगने के कारण अलग अलग होते हैं। अलग-अलग खेल में शरीर के अलग अलग भाग खतरे में होते हैं।

स्पोर्ट्स मेडिसिन की ट्रेनिंग
खिलाड़ियों को स्पोर्ट्स मेडिसिन के अंतर्गत बेसिक प्रशिक्षण दिया जाता है। ताकि वह चोट का प्राथमिक उपचार खुद ही शुरू कर दें। चोट लगने पर उसके इलाज का काम खिलाड़ी से ही शुरू हो जाता है। उसके बाद फिजिकल ट्रेनर, थेरेपिस्ट और कोच की भूमिका होती है। बात अधिक बढ़ जाने पर डाक्टर के पास जाना होता है।

पांडेय बताते हैं कि हमारे यहां मास्टर्स डिग्री में एथलीट्स केयर एवं रिहैबिलिटेशन का पाठ पढ़ाया जाता है। उसमें यही मूलभूत जानकारियां दी जाती हैं कि जब तक डॉक्टर आए, तब तक क्या करें। जैसे बर्फ लगाना, क्रेप बैंडेज बांधना, गर्म पानी की पट्टी से सिकाई और कुछ विशेष एक्सरसाइज आदि अलग अलग चोटों की प्राथमिक चिकित्सा हैं।

डाइट की अहम भूमिका
फिटनेस में डॉक्टर पांडेय डाइट की भी विशेष भूमिका बताते हैं। वह कहते हैं कि यह तो सभी जानते हैं कि सेहतमंद भोजन से व्यक्ति स्वस्थ रहता है। प्रोपर डाइट व प्रोपर लिक्विड शरीर की फिटनेस के लिए बहुत जरूरी होते हैं। इसके साथ-साथ विटामिन-सी आदि की गोलियां भी ली जाती हैं। गर्मी और उमस से बचने के लिए तरल पदार्थ भी शरीर में पर्याप्त मात्रा में जाने चाहिए।

दिल्ली विश्वविद्यालय में फिजिकल एजुकेशन एवं स्पोर्ट्स डायरेक्टर डॉ. जी.एस. नरूका कहते हैं कि किसी भी खिलाड़ी को प्रशिक्षित करते हुए हम उसे स्पोर्ट्स मेडिसिन पर तीन अध्याय पठाते हैं। पहला है प्रिवेंशन, दूसरा क्यूरेटिव एवं तीसरा है रिहैबिलिटेशन, सबसे महत्वपूर्ण प्रिवेंशन है। इसके लिए डॉ. नरूका उदाहरण देते हैं कि जिस प्रकार किसी गाड़ी को एकदम से स्पीड में नहीं डाला ज सकता, उसी प्रकार किसी खिलाड़ी को एकदम से खेल के मैदान में रफ्तार पकड़ने के लिए नहीं कहा ज सकता।

जैसे गाड़ी को हम पहले गियर एवं दूसरे गियर के बाद तेज रफ्तार के गियर में डालते हैं, उसी प्रकार खिलाड़ी को वार्म अप, कंडीशनिंग और फिटनेस प्रोग्राम के बाद मैदान पर उतारा जता है। दूसरे, क्यूरेटिव में चोट का इलाज होता है और तीसरे रिहैबिलिटेशन में खिलाड़ी को मैदान में लौटने के लिए तैयार किया जता है। इसमें फिजियोथैरेपी, योगा आदि के कार्यक्रम रखे जते हैं।

खेल कोई भी हो, यह मानदंड जरूरी होते हैं। नरूका कहते हैं कि इनमें सबसे महत्वपूर्ण प्रिवेंशन का कार्यक्रम है। यदि खिलाड़ी पूरी तरह तैयार होकर मैदान पर जएगा तो चोट ही नहीं लगेगी। सो अन्य कार्यक्रम की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।

डॉ. नरूका मानते हैं कि फिजिकल ट्रेनर टीम के खिलाड़ियों को मैदान पर जने के लिए पर्याप्त रूप से तैयार करते हैं पर सीनियर खिलाड़ी अकसर इस मामले में थोड़ी लापरवाही कर सकते हैं। यही लापरवाही आगे चल कर चोट का कारण बनती है।

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