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भारत-ईरान रिश्तों का अमेरिकी पेंच

भारत में इक्का-दुक्का लोगों को छोड़कर बहुत कम की रुचि ईरान के घटनाक्रम में है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि मौजूदा सरकार अपने नये-नवेले दोस्त और सामरिक साझेदार महाबली अमेरिका को नाराज करने का जरा सा खतरा भी उठाने को तैयार नहीं।

इसी तरह एक अन्य वजनदार कारण यह भी है कि ईरान की पहचान हमारे लिए एक कट्टरपंथी इस्लामी राज्य की है, जिसके संबंध ‘धर्मनिरपेक्ष’ भारत के साथ तनावग्रस्त ही रह सकते हैं। इस नतीजे तक पहुंचने में बहुत जल्दबाजी की जाती है कि ईरान की सहानुभूति समानधर्मा पाकिस्तान के साथ ही रहेगी। हाल के वर्षों में ईरान का राक्षसीकरण करने में अमेरिका ने कोई कसर नहीं छोड़ी है और हम हिन्दुस्तानियों ने आत्मघातक अंदाज में अमेरिकी फतवों को सर-माथे पर बिठा लिया है।

यह समझना बहुत जरूरी है कि इस्लामी गणतंत्र होने के बावजूद आज का ईरान सउदी अरब जैसे देशों से बहुत फर्क है। अंतर सिर्फ इतना नहीं कि एक कबाइली-दकियानूस राजशाही है और दूसरा कमोबेश जीवंत जनतंत्र और गणराज्य। यह बात भी रेखांकित की जानी चाहिए कि ईरान शिया इस्लाम का प्रतिनिधित्व करता है और जिस हिंसक कट्टरपंथी से दुनिया लहूलुहान है, उसके लिए सुन्नी-वहाबी संप्रदाय के अनुयायी जिम्मेदार हैं।

धर्मपरायण मुसलमान होने के साथ-साथ ईरान को अपने पारंपरिक सांस्कृतिक उत्तराधिकार पर भी गर्व है। इस्लामी क्रांति की सफलता के पहले रजशाह पहलवी के शासनकाल में इस देश की पहचान पश्चिमी नमूने की आधुनिकता को अपनाने वाले ‘प्रगतिशील’ राष्ट्र की थी। यह सोचने का कोई कारण नहीं कि पिछले तीन दशकों के अनुभव ने ईरानियों की जातीय स्मृति को और राष्ट्रीय स्वाभिमान को पूरी तरह नष्ट कर दिया है।

जिस तरह शाह के युग में आज सर्वशक्ितमान इस्लामी क्रांतिकारी भूमिगत रहे थे, उसी तरह इस बात की प्रबल संभवाना है कि इस्लामी कट्टरपंथी के दौर में उदारवादी मानवीय जनतंत्र के समर्थक तत्व अदृश्य हैं। इस बार चुनाव में अहमदीनेजाद को जिस तरह के मजबूत विपक्ष का सामना करना पड़ा, उससे यही बात स्पष्ट हुई है कि ईरान के बारे में सुनी-सुनाई बातों और पराई आंखों से देखी ‘घटनाओं’ के आधार पर किसी सरलीकरण तक पहुंचने को मूर्खता ही कही जा सकती है।

भारत के साथ ईरान (फारस) के संबंधों का इतिहास हजारों साल पुराना है। इस्लाम के अभ्युदय के पहले से ही दोनों देशों के बीच आर्थिक राजनयिक रिश्ते घनिष्ट रहे हैं। खान-पान हो या पहनावा, भवन निर्माण शैली हो या संगीत, इन पर ईरानी छाप सुस्पष्ट है। सूफी दर्शन भी ईरान से भारत पहुंचा। एक दौर था, जब भारत के कश्मीर प्रदेश को ईरान सगीर यानी छोटा ईरान कहा जाता था। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद भी भारत और ईरान के संबंध दोनों पक्षों के लिए लाभप्रद और मधुर रहे हैं। कुछ वर्ष पहले तक इस संदर्भ में अक्सर कुदरेमुख लौह परियोजना का उल्लेख किया जाता था।

यह बात भी भुलाई नहीं जा सकती कि ईरान संसार के सबसे बड़े तेल उत्पादकों में एक है। अपनी ऊर्जा सुरक्षा के संदर्भ में भारत के लिए उसका विशेष सामरिक महत्व है। संयोगवश आज ईरान के पास तेल और गैस के प्रचुर भंडार तो हैं पर इसके शोधन का तकनीकी कौशल और संसाधन सुलभ नहीं। इसीलिए उसे भारत जैसे सहयोगियों की दरकार है।

अमेरिकी राष्ट्रपति बुश के कार्यकाल तक अक्सर ईरान से बरास्ता अफगानिस्तान-पाकिस्तान भारत तक आने वाली पाइप लाइन की चर्चा गर्म रहती थी। जब से मनमोहन सिंह ने जल्दबाजी में यह ऐलान कर डाला कि लाभलागत की दृष्टि से यह परियोजना व्यावहारिक नहीं तब से सभी विशेषज्ञों ने बहती बयार के साथ पीठ पलट ली। सिर्फ ऊर्जा सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि भारत-पाक संबंधों में तनाव घटाने के लिए और अफगानिस्तान को शांत-स्थिर बनाने के लिए भी इस परियोजना की उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता। भारत की अरुचि का कारण सिर्फ एक है।

अमेरिकियों को भारत और ईरान का एक-दूसरे के समीप आना कतई रास नहीं आता। पहला टकराव तो अमेरिकी तेल कंपनियों और ईरानी-सरकारी तेल कंपनी के स्वाथरें का है। इसी के साथ जुड़ा सवाल यह भी है कि अपने तेल की कमाई से अर्जित धनराशि से ईरान को अपनी परमाणविक महत्वाकांक्षा पूरा करने का बेहतर मौका मिल जायेगा। परमाणविक प्रसार के मामले में अमेरिका हमेशा दोहरे पाखंडी मानदंड अपनाता रहा है।

भारत और ईरान के सामने इस क्षेत्र में स्वावलंबन का प्रश्न प्रभुसत्ता और स्वाधीनता के साथ जुड़ा है। हम पर रोक-टोक के लिए तो अमेरिका कमर कसे रहता है, पर पाकिस्तान की परमाणविक तस्करी को अनदेखा ही नहीं करता, बल्कि पुरस्कृत भी करता है। उत्तरी कोरिया के बारे में भी उसका संयम आसानी से समझ नहीं आता। हकीकत यह है कि भारत के साथ परमाणु ऊर्जा वाला करार अमेरिका ने इसीलिए किया कि उसे ईरान से विमुख किया जा सके।

जबसे क्रांति के तत्काल बाद ईरानियों ने अमेरिकी राजनयिकों को सालभर से ज्यादा बंधक-बंदी बनाये रखा, तभी से अमेरिका के जिगर में उनको लेकर लाइलाज खलिश है। बंधकों को छुड़ाने के लिए उनका दुस्साहसिक सैनिक अभियान भी बुरी तरह असफल हो गया था। फिर ईरान-कोन्ट्रा प्रकरण भी की याद दिलाने की जरूरत है। कड़वा
सच यह है कि ईरान के राक्षसीकरण की जरूरत अमेरिका को इसीलिए पड़ती है कि उसे अपनी करतूतों पर लीपापोती के लिए और कुछ न करनी पड़े।

हमारी समझ में सिर्फ यह बात नहीं आती कि हिन्दुस्तानियों की क्या मजबूरी है कि हम ईरान के साथ अपने रिश्तों को अपने राष्ट्रहित में नहीं अमेरिकी स्वार्थ साधन के लिए करे। यह सोचने का कोई कारण नहीं कि इस्लामी कट्टरपंथ को अपनाने वाला ईरान भारत को सिर्फ सांप्रदायिक आधार पर अपना शत्रु मानता है और मानता रहेगा। समानधर्मा ईराक के साथ उसने लगभग एक दशक तक सर्वनाशक खाड़ी युद्ध लड़ा था।

ईरानी नीति का आधार सिर्फ इस्लाम नहीं। हमारी परेशानी यह है कि जब भी ईरान के साथ भारत के संबंधों की चर्चा होती है तो इसे नाहक ही पाकिस्तान की समस्या के साथ जोड़कर देखा जाता है। या फिर ‘धर्मनिरपेक्ष’ सरकार अल्पसंख्यक मतदाताओं को रिझने के लिए कहती कुछ है पर करती वही है, जो अमेरिकी आका चाहते हैं। हमारा निवेदन है कि भारत और ईरान के रिश्ते राष्ट्रहित की यथार्थवादी कसौटी पर कसने के बाद ही संपादित किये जाने चाहिए। किसी नये-पुराने मित्र से सलाह सीख या सबक की जरूरत नहीं और न ही इस मामले में नाजायज दबाव बर्दाश्त किया जाना चाहिए।

pushpeshpant@ gmail. com

लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं

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