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वर्तमान में रहें

मुंबई में हर दिन सैकड़ों लोग बड़े-बड़े सपने लेकर आते हैं। उनमें इक्के-दुक्के ही कामयाब होते हैं। बाकी लोगों के सपने थककर चूर हो जाते हैं। या तो उनके लक्ष्य बदल जाते हैं या फिर वे अपने घरों की ओर लौट जाते हैं। ऐसी अनेक घटनाएं हुई हैं, जब सपने को पूरा करने आए लोग निराशा की स्थिति में आत्महत्या तक करने को मजबूर हुए हैं। मनोरंजन क्षेत्र में आने वालों को स्ट्रगलर कहा जाता था। लेकिन वह शब्द अब लुप्त हो रहे पक्षियों की तरह गायब हो रहा है। स्ट्रगलर अब कोई कहलाना पसंद नहीं करता। जबकि यही शब्द कभी ताकत देता था। 

हिन्दी फिल्मों के सबसे लोकप्रिय संगीतकार (स्व़) नौशाद ने जब बातों-बातों में एक बार कहा कि दादर के फुटपाथ पर साते हुए बार-बार सोचता था कि सड़क पार जो थियेटर है, उसमें मेरी फिल्म पता नहीं कब लगेगी? यह सोचते हुए कभी-कभी निराश भी हो जाता था। क्योंकि स्ट्रगल लंबा हो रहा था। मगर अगले ही पल खुद को संभालता था और ऊपर आसमान की ओर ताकने लगता था। तब न तो अतीत को याद करता था और न भविष्य को। वर्तमान में आ जाता था। यानी खुद की असलियत को सामने रखकर स्ट्रगल करने के लिए निकल जाता था। आखिर वह सपना 12-13 साल में पूरा हुआ, मगर हुआ।

नौशाद साहब का संकेत था कि खुद के प्रति जागरूक रहना बहुत जरूरी है। आदमी या तो ज्यादा समय अतीत में बिताता है या भविष्य की कल्पनाओं में। वह सपने को संभालकर रखता है, लेकिन वर्तमान को भूल जाता है। 

भगवान बुद्ध से लेकर दलाई लामा तक और महावीर से लेकर महाप्रज्ञ तक ने सफलता के लिए जो एक महान सूत्र बताया, वह है - जागरूक रहना और वर्तमान में जीना। लेकिन आदमी की ऐसी आदत बन गई है कि आज की बजाए कल में जीता है। अभी जो कुछ कर रहा है, उस पर ध्यान नहीं रहता, बहुत आगे चला जाता है। जबकि जागरूकता की एक ही पहचान है- तन्मय हो जाना। जो काम करे उसी का हो जाना। यही सफलता का प्रस्थान बिंदु है।

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